बस बच्चों को पाल कर बड़ा कर दो. उनसे कुछ उम्मीद मत रखो.

बुढ़ापे की मजबूरी
पति के देहांत के बाद में अपने एक लौते बेटे के यहाँ रहती थी.मेरी बहूँ का एक अलग ही रूप मुझे देखने मिला. साथ ही बेटे का भी. दोनों के मन में क्या है में अच्छे से जानती हूं. वो चाहते है कीं में वृद्धा आश्रम चली जाऊ. उनके जानें के बाद मुझे यह सब देखना और सुनना पड़ेगा इसका मुझे अंदाजा भी नहीं था. पर में मन मान कर अपने बेटे और बहूँ कीं बाते सुनकर भी यहाँ रहती हूं क्यों कीं मुझे मेरे पोते और पोती दिखाई देते है. उनकी झलक पा कर मुझे सुकून मिलता है.
घर के बाहर एक टिन कीं झोपडी में रहती हूं|
मेरी बहूँ को कोई दिक्कत नहीं हो इसलिये में घर के बाहर रहती हूं. बेटे नें थोड़ी मेहरबानी कीं है तो ऊपर टिन कीं चादर लगवा दी है. समय समय पर थोड़ा राशन दे देता है तो में अपना बनाकर खा लेती हूं. मैंने अपने बेटे को कह दिया है कीं मेरी वजह से उन दोनों को कोई प्रॉब्लम नहीं होंगी बस मुझे यही रहने दे. इसी घर में मुझे मर जानें दे. में बस यही चाहती हूं. में अपने आप को खुश किस्मत समझती हूं कीं मेरे बेटे और बहूँ कम से कम मेरे लिये इतना तो कर रहें है. मेरा बेटा सुबह 9 बजे नौकरी जाता है. और बच्चे भी उसी समय स्कूल जाते है. फिर शाम को 6 बजे मेरा बेटा वापस आता है. बच्चे 3 बजे आते है. उन्हें आते जाते निकलते देख मुझे बड़ा सुकून मिलता है.

मेरे पति के दोस्त जब कई दिनों बाद आये|
मेरे पति के दोस्त थे. उनकी पत्नी का भी स्वर्ग वास हो गया है. उस समय पर वो हमारे घर पर आया करते थे. उनसे हमारे अच्छे रिश्ते थे. उनका घर हमारे घर से थोड़ी दूरी पर था. पैरो में समस्या हो गई थी ठीक से चल भी नहीं पाते थे. वो बड़े दिनों बाद मेरे यहाँ आये. मुझे उन्हें देख कर अच्छा लगा. उनका हाल भी मेरी तरह ही था. बच्चे अब उनसे भी परेशान थे.आकर मेरे पास अपना दुखड़ा रोते थे और उन दिनों को याद करते थे. बुढ़ापा हम जैसो को बहुत रुलाता है. उनकी पत्नी का स्वर्ग वास हो गया था. और उन्हें चलने उठने में समस्या थी. इसलिये वो तो अपना खाना भी नहीं पाते थे. मेरे पास आये तो में समझ गई कीं यह इतनी मुसीबत में चल कर पुराने दोस्तों के यहाँ चाय और खाने कीं चाह में ही जाते होंगे. उनकी भी अपनी मज़बूरी थी. वो आये तो मैंने उनके लिये खाना बनाया. और उन्हें खिलाया. मना कर रहें थे नहीं खाना लेकिन मुझे पता था कीं उनको भूख लगी है.

बहूँ नें खाना नहीं दिया|
मेरी बहूँ नें मुझे और उन्हें खाना खाते देख लिया. वो कुछ भी ना बोली.ऐसे ही वो यहाँ 2 -3 बार आये. जब भी वो आते में उन्हें खाना खिलाती. फिर उनके जानें के बाद जब मेरा बेटा आया तो बहूँ कहती है कीं तुम्हारी माँ कितनी बेशर्म है. पता नहीं किस किस को आजकल बुला कर खाना खिला रही है. बड़ी मुश्किल से कमाया जाता है और यह लुटाने में लगी.इनका राशन बंद करो कुछ दिन भूखी रहेगी तो अक्ल ठिकाने आयेगी. मैंने कहां कीं में अपने हिस्से का उन्हें खिलाती हूं तुम्हारे पिता के पुराने मित्र है.
फिर भी बहूँ का उल्टा सीधा बोलना शुरू रहा.घर के बाहर रहकर इनको आजादी मिल गई है पता नहीं क्या क्या करती है.बेटा भी बोला कीं कुछ दिन भूखा ही रहने दो इन्हे. मुझे मेरे बेटे नें घर के पीछे सीडी के पास लें जाकर बिठा दिया कहां कीं अब यही बैठो. मेरे तो अब आँसू भी सुख गये थे. अगले दिन मुझे खाना नहीं मिला. मेरे टिन के उस छोटे से कमरे को बहूँ नें तोड़ दिया.

तब मुझे लगा कीं अब में गलत कर रही हूं |
1 दिन पूरा भूखा रहने के बाद मैंने सोचा कीं में गलत कर रही हूं. मुझे अब अपने बेटे के यहाँ नहीं रहना चाहिये.और शायद गलती भी मेरी ही है. मेरी ही परवरिश में कोई कमी रही है तभी तो यह परिणाम आया.अगली सुबह मैंने अपने बेटे को कहां कीं मुझे वृद्धा आश्रम छोड़ आ अब में तुम दोनों को ज्यादा परेशान नहीं करना चाहती. बहूँ नें कहां कीं एक दिन भूखी रही तो अक्ल ठिकाने आ गई ना. बेटे के चेहरे पर भी अजीब सी ख़ुशी थी जल्दी से तैयार हो गया. मुझे छोड़ने के लिये. बहूँ कह रही थी कीं आज कीं छुट्टी लें लों यही आस पास मत छोड़ आना कहीं 3 दिन में वापस आ जाये. मैंने अपनी बहूँ से कहां कीं बेटी चिंता मत कर में अब नहीं आउंगी. मैंने अपने पोता पोती को गले लगाया. मुझे पता था कीं अब मिलना नहीं हो पायेगा. बेटे को भी चाहती थी कीं एक बार जी भर के गले लगा लू. लेकिन वो बोला चलो जल्दी करो. मैंने बहूँ को कहां कीं बेटी अपना ध्यान रखना.मेरा बेटा मुझे छोड़ आया. वहाँ आकर मैंने देखा कीं मेरी तरह कई है. थोड़े दिन उदास रहते है फिर सच को स्वीकार कर लेते है. में अब यहाँ खुश हूं. कुछ काम भी करती हूं. में चाहती हूं कीं ऐसा कहूं कीं ऐसा किसी के साथ ना हो लेकिन ऐसा कब किसके साथ हो जाये कोई बता नहीं सकता.लेकिन माँ बाप को ऐसे समय के लिये भी तैयार रहना चाहिये. बस बच्चों को पाल कर बड़ा कर दो. उनसे कुछ उम्मीद मत रखो.

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निशाकांत शर्मा (सहसंपादक)

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