चिन्तन——
पृथिवी ,या धरती ,या वसुंधरा,कहें या अवनी या धरा कहें ….इन सब शब्दों में निहित है ‘वाम’ तत्व — अर्थात् ‘वामा ‘!! प्रकृति में भी निहित है -‘वामा’!!
वामा का अर्थ है स्त्री तत्व ।
निहित रूप में स्त्री तत्व मेंवही अग्नि होती है जो पुरुष तत्व में होती है ।सृष्टि उत्पत्ति के संदर्भ में पृथ्वी के साथ अग्नि ( पंच तत्व में से एक ) को भी कारक मानते हैं ।स्त्री में आत्मा की वही अग्नि ,वही मोनाद प्रज्वलित है जो पुरुष में है ।स्त्री में समस्त ऊर्जाएँ होती हैं और रचनात्मक ऊर्जा तो और भी अधिक होती है ।वामा (स्त्री ) का मानस तंत्र पुरुष से अधिक परिष्कृत होता है। यही कारण है कि पृथिवी और प्रकृति को सर्वोच्च देवित्व का स्थान प्राप्त है ।
फिर वही षड्यंत्र हुआ —स्त्री (प्रकृति ) को पतित कर पुरुष तत्व का खेल !! उसे पता थाकि स्त्री के पतित होने के साथ मानवता भी अनिवार्य रूप से भ्रष्ट और पतित हो जाएगी ।पुरुष तत्व मानव हृदय का ध्यान रखे बग़ैर , एकाधिकार का प्रयास करता रहा । यह एकाधिकार ही है जो हमारी पृथिवी को गर्त (विनाश ) की ओर ले जा रहा । प्रकृति का असंतुलन और विध्वंस आज जीवन के सभी क्षेत्रों में दिखाई देता है
वास्तव में साम्राज्यों , राष्ट्रों का पतन हुआ है और देशों , सभ्यताओं का विनाश हुआ है तो इसीलिए कि मानव ने ‘सन्तुलन ‘ के प्रश्न को निरर्थक बना दिया है ।
तो आइए इस ‘चिन्तन ‘ के बहाने ही सही —- “ चेतन रूप से अस्तित्व के उद्दीपक रूप में सन्तुलन की शक्ति , मूल कारणों की और सौंदर्य की शक्ति की पुष्टि करें ।”
-डॉ. निरुपमा वर्मा –