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ये कैसा दान है,जो लेने बाले से देने बाले का हक ज्यादा रहता है—

आस्चर्य हम आजतक कन्या के दान का मतलब ही नहीं समझ सके-
बेटी की शादी मे माता पिता द्वारा किया गया कन्या का दान और फिर उसकी जिंदगी मे, जिंदगी भर मालिकाना पति और उसके परिपार पर हावी होकर अपना रुतबा बनाए रखना उस दानको न पति की पहचान होने देते है न उसके परिवार को अपना बनने देते है, बात बात मे बेटी की चौकीदारी दान पर ये कैसा बिजनेस हो रहा है हम आजतक न कोर्ट के इंसाफ को समझ पाए न समाज और माता पिता द्वारा किया बेटी के इस कन्या के दान को जो कानून द्वारा बनसाइड दहेज केस पति को अपमानित करते सभ्य परिवारों को कोर्ट कचहरी और पुलिस सजा काटने तक का अपमान समाज मे भोगना पड़ता है,हाँ मेरा यह लेख महिलाओं से लेकर बहुत लोगों को पढकर आस्चर्य मे डाल सकता है,तो बताना होगा कि मै भी किसी की बेटी और महिला हूँ, हर गुनाह की पारदर्शिता होना जरूरी है, हमे नफरत है गुनाहों से इंसानों से नहीं यह बेवजह कहां पनप रहा है कानून को—–लेकिन कन्या दान और दहेज के केस समाज के गले मे फंसी वह हड्डी है जो न निकाली जा सकती है न उगली—-और कन्या का दान करने बाले जब इसपर झूठा बिजनेस करते है,तब यह कहना गलत नहीं होगा कि माता पिता को इस केस से कोई लेना देना नहीं होना चाहिये,यहतो उस दान का अपमान है जो आपने दिया और सूत समेत उसे वापस—–आपकी बेटी के साथ जो भी गया है वह दहेज नहीं आपकी बेटी ने आपके घर और कोख से जन्म लिया है तो उसका अधिकार बनता है माता पिता की प्रोपर्टी मे जैसे कानून ने जमीन मे बेटियों की बेटों के बराबर हिस्सेदारी सुरक्षित की है,हाँ मै निष्पक्ष जनहित मे कहना चाहूंगी कि बेटी कोई बस्तु नहीं जिसका हमारा समाज सदियों से दान करता आ रहा है,मै औरत हूँ गर्व से कहना चाहूंगी कि मै दो कुलों की मालिक और चिराग हूँ,हो सके तो दान मे अपनी बेटियों कोअच्छे संसकार दहेज मे लीजिए जो आधी जिंदगी बाप के घर और शेष अपने और पति के घर को चला सकें।
लेखिका, पत्रकार, दीप्ति चौहान।