खुले हैं भोजनालय – खुले हैं मदिरालय — उड रही हैं सोशल डिसटेन्स की धज्जियां, एटा में लॉक डाउन के दौरान मानवीयता का नगां सच , कहां गए समाजसेवी
एटा! वैश्विक महामारी के संक्रमण से बचाव एवं रोकथाम के लिए भारत सरकार द्वारा लागू किऐ गए लॉक डाउन के कारण बन्द हुऐ उधोगों से बेरोजगार हुए सर्वहारा मजदूर वर्ग ने रोटी की भूख मिटाने के लिए जब अपने गांव व घरों के लिए हजारों किलोमीटर का सफर मय परिवार पैदल यात्रा कर करके प्रारम्भ किया तो सरकार के कान तो खडे हो ही गऐ साथ ही कई कई दिनों से भूखे प्यासे हाल में पैदल ही चले आ रहे प्रवासी मजदूरों के प्रति दरियादिली दिखाकर एटा शहर में भी स्यंंम्भू प्रमुख समाजसेवियो ने मुख्य मार्गो पर कैम्प लगाकर उनके लिए भोजन व्यवस्था कर सराहनीय कार्य किया ! तो वहीं जिला प्रशासन द्वारा भी जिला पंचायत में सामुदायिक भोजनालय का संचालन कर गरीबों की भूख को मिटाने हेतु सरकार के निर्देशों पर अपने दायित्वों का निर्वहन किया ! लेकिन सरकार ने जैसे ही लॉक डाउन में कुछ शिथिलता बरती तो मदिरालय व भोजनालयों में उमडी भीड के अतिरेक ने सोशल डिसटेन्स की धज्जियां तार तार कर दी ! समझ में आया कि इंसान को कोरोना वायरस के संक्रमण से मौत होने का इतना भय नहीं है जितना भूख से तडफकर मर जाने का है ! बात मे सौफीसदी दम उस समय नजर आई जब जीटी रोड स्थिति इलाहाबाद बैकं के बाहर चिलचिलाती धूप की गर्मी में भूख प्यास से बे-हाल निर्वस्त्र अवस्था में एक नौजवान युवक कुडे के ढेर पर बैठा हुआ बडे ही इतमीनान से वहां पडे सैकड़ों दौने को एक एक करके अपने हाथों से उठाकर चाट रहा था ! अचानक संवाददाता की नजर में जब वह कैद हुआ तो उसकी मानसिक स्थिति का आकंलन करने का प्रयास किया गया तो पता चला कि वह पूर्णरूप से विक्षिप्त नहीं है ! उसने अपना नाम व गांव का तथा अन्य परिस्थितियों की जानकारी दी ! तभी अचानक मन द्रवित हो उठा ! मन में तमाम सवाल कि अपने आपको स्यंंम्भू प्रमुख समाजसेवी कहते नहीं थकते तथा जिला अस्पताल में मरीजों को एक दो रूपऐ का पारले जी का पैकेट एवं दो कैले वितरण करने के बाद अखबारों व सोशल मीडिया पर शेयर करने वाले असल में समाज के अन्दर अपनी पहचान बनाने के लिए भूखे होते हैं ! जबकि जमीनी हकीकत मैं लॉक डाउन के दौरान तमाम ऐसे नंगे सच सडकों पर देखने को मिल जाऐगें जिन्हें देखकर मानवीय संवेदनाओ का मन में उदय होगा तभी उनकी मदद करने वाला वास्तविक समाजसेवी अपने आपको गुमनाम के नाम से ही पीडित की मदद कर अपने मुकाम की ओर रूख कर लेगा ! वह कभी नहीं चाहेगा कि मदद करते हुए उसका कोई चित्र किसी अखबार में छपे या सोशल मीडिया पर वायरल हो !.ऐसे लोग अपनी पहचान गुमनाम बनाने में प्रसन्नचित रहते हैं !.