तमकुहीराज/ कुशीनगर, ..आज 11 दिन हुए हम लोगों को दिल्ली से चले हुए। रास्ते में थोड़ा फल फ्रूट या पानी पी लेते हैं और रात तो रोड पर ही सो कर गुजारना पड़ता है साहब….।
यह कहना है बिहार के छपरा जिला निवासी जय नाथ राजू तथा उनके अन्य साथियों का। कोरोना महामारी देश को एक ऐसे मुहाने पर लाकर खड़ा कर दिया है जहां मानो जिंदगी थम सी गई है। देश में लॉक डाउन है जिसके चलते शहरों में सारी कंपनियां तथा फैक्ट्रियां बंद हो गई हैं। दूरदराज के गांव से अपनी रोजी-रोटी की तलाश में शहरों में गए मजदूरों के सामने अब संकटों का पहाड़ खड़ा हो गया है। उनकी रोजी-रोटी चली गई है। ये मजदूर बेरोजगार हो गए हैं और किराए के मकानों में कैद हैं।
अब इन्हें समझ में नहीं आ रहा कि यह क्या करें? अपने और अपने परिवार का पेट भरने के लिए दो पैसे कहां से लाएं । पहले तो वह किसी तरह इस आस में रुके हुए थे कि लॉक डाउन जल्द ही समाप्त हो जाएगा और उसके बाद किसी तरह मेहनत मजदूरी करके जीवन सामान्य कर लेंगे। परंतु उन्हें क्या पता था यह कोरोनावायरस इतनी जल्दी हार मानने वाला नहीं है। नतीजा लॉक डाउन की अवधि आगे बढ़ने लगी। अब शहरों में जीवन बिताना इन गरीब मजदूरों के लिए कैद खाने से भी बदतर हो गया है। सरकार ने गाड़ियों की सुविधा तो शुरू की है पर इतने पर्याप्त मात्रा में नहीं कि यह लोग आसानी से अपने घर पहुंच सकें। इस तरह से तो इन्हें घर पहुंचने में महीनों लग जाएंगे। आगे फिर शहरों तथा गाड़ियों के क्या हालात होंगे इसका क्या पता?
इन बेरोजगार मजदूरों के सब्र के बांध टूटने लगे मसलन इन्हें सैकड़ों मील की दूरी छोटी लगने लगी है अर्थात भूख के सामने मौत जैसी कठिनाइयां छोटी लगने लगी है ।ये तो सैकड़ों मिलो की दूरी पैदल ही तय करने चल दिए। साथ में कुछ महिलाएं भी हैं जिनमें कुछ के तो गोद में आंचल के नीचे छिपे बैठे हैं नन्हे शिशु जो इस दुनिया के उथल- पुथल से बिल्कुल अनजान है। ऊपर से कपड़ों की गठरिया, बैग आदि रास्तों को इनके लिए और कठिन बनाते हैं। कोई 7 दिन पहले से चला है तो कोई 10 ,12 यहां तक कि 15 दिनों से भूखे प्यासे लगातार सफर कर रहे हैं। इनके दर्द सुने तो कलेजा निकल के बाहर आ जाता है।ये भूख, प्यास तथा बदलते मौसम की मार को सहते हुए किसी तरह से अपने अशियाने मे पहुँचना चाहते हैं। जहां इनके अपनों की आंखें इंतजार कर रही हैं। परंतु रास्ते में ही इनकी कठिनाइयों के आगे कईयों की जिंदगी हार मान चुकी है। और कुछ लोग उनका सामना कर आशियाने की तरफ बढ़ रहे हैं।
अगर यह घर पहुंच जाते हैं तो कुछ दिनों तक अपने घर परिवार से दूर ही रहना पड़ेगा। रास्ते में कोई सवारी भी इनको मददगार नहीं हो रहे हैं। इसी तरह का एक पैदल जत्था हमें एनएच रोड पर मिला। बिहार के छपरा जिला निवासी जयनाथ तथा राजू से हमारी बात हुई। उन्होंने बताया हम 11 दिन से लगातार सफर कर रहे हैं, हम दिल्ली से आ रहे हैं, और आगे छपरा तक जाना है। हमारे साथ हमारी बीवी बच्चों को भी काफी परेशानी हो रही है। हम चलते चलते रोड पर ही कहीं किनारे थक कर सो जाते हैं और फिर वही से अपने यात्रा फिर शुरू करते हैं। खाने पीने का सामान हम कुछ वहीं से लेकर चले थे जो रास्ते में समाप्त हो गए अब हमें पानी पीकर या थोड़े बहुत फल खाकर ही रहना पड़ता है। जब मौसम बिगड़ता है और बारिश होती है तो हमें बच्चों की फिक्र रहती है। साथ में छोटे-छोटे बच्चे हैं और ऊपर से कुछ सामान लेकर चलना है बहुत परेशानी हो रही है साहब। जब हमने पूछा कि रात के आराम आप लोग कैसे करते हैं या कैसे सोते हैं तो उन्होंने बताया, रात में रोड पर चलना बहुत डर लगता है क्योंकि बसें गाड़ियां आदि आती रहती हैं। रात तो हमें रोड के किनारे ही सोकर गुजारनी में पढ़ती है साहब…। यह कहते कहते उनके कंठ रुद्ध जाते हैं। इस तस्वीर को देखिए आपके आंखों से आंसू निकल आए तो कहिए गा। एक पैदल जत्था रोड के किनारे आराम कर रहा है तभी एक ट्रक उधर से आती है उस पर गिट्टी लदी हुई है। कुछ लोग उसे हाथ दे रहे हैं। जैसे ही ट्रक आगे रूकती है वहां बैठे सभी लोग ट्रक के तरफ दौड़ पड़ते हैं। और उस पर बैठने की कोशिश करते हैं इस आस में यह ट्रक उनके दूरी को कुछ हद तक कम कर देगा परंतु ट्रक ड्राइवर तुरंत मना कर देता है जिससे मायूस होकर वे पुनः वापस रोड किनारे आकर बैठ जाते हैं
हम इनके दर्द को शब्दों में लिखने की कोशिश कर सकते हैं परंतु दिखा नहीं सकते। इन पंक्तियों के माध्यम से इनके दर्द को महसूस किया जा सकता है..
ऐ देने वाले गरीबी ना दे, मौत दे दे मगर बदनसीबी न दे।