
च…च फिर मिस्टेक हो गई। इस बार नसीब चौधरी के घर पर बुलडोजर चल गया। पहले ऐसे ही मिस्टेक से आर्यन मिश्र पर गोली चल गई थी। बेचारे गोरक्षकों से पहचानने में गलती हो गई। गोली चलाई मुसलमान पर‚ जा लगी ब्राह्मण पुत्र को। सिली मिस्टेक। इस बार जयपुर नगर के अधिकारियों ने बुलडोजर चलाया मुसलमान के घर पर। घर गिर गया हिंदू जाट नसीब चौधरी का। फिर से सिली मिस्टेक। क्या कीजिए‚ बड़े–बड़े अभियानों में ऐसी छोटी–छोटी गलतियां हो ही जाती हैं!
वैसे सच पूछिए, तो गलती नसीब चौधरी की ही थी। एक नहीं, बंदे ने तीन–तीन गलतियां की थीं। पहली तो यह कि आरएसएस वालों से उलझना ही क्यों थाॽ एक तो आरएसएस वाले। उस पर गुरु पूर्णिमा का यानी खीर खाने का मौका। खुशी से बेचारे जरा डीजे–वीजे बजा रहे थे‚ तो बजा लेनेे देते। आखिर‚ नये जमाने के राजा हैं। जब जी करेगा, खुशी मनाएंगे ; जब जी करेगा, डीजे बजाएंगे। उसमें टोका–टाकी करने की जुर्रत करनी ही क्यों थीॽ राजा लोग तो अपनी खुशी के लिए शहर के शहर जलवा देते थे‚ फिर भी कोई कुछ नहीं कहता था। उल्टे सब यही कहते हैं कि हुजूर का शौक सलामत रहे‚ हैं शहर और बहुत! पर चौधरी का परिवार तो जरा से शोर पर ही आपत्ति करने आ गया –– बंद करो, ये बेवक्त की शहनाई। शहनाई के लिए भी कोई वक्त देखा जाता है क्याॽ जाट बुद्धि‚ वक्त में अटके रहे‚ यह नहीं देखा कि शहनाई बजा कौन रहा हैॽ दूसरी गलती‚ संस्कारी संघियों के साथ‚ चौधरी के घर की महिलाएं उलझ गईं। संघ के संस्कार –– करने लगे महिलाओं की पूजा‚ लात–घूंसों से। महिलाओं के साथ पूजा के सिवा और कोई व्यवहार तो बेचारों के संस्कार में ही नहीं है। नसीब की आखिरी और सबसे बड़ी गलती –– मुसलमानों जैसा लगने वाला नाम रखा ही क्योंॽ करा दी ना हिंदू–रक्षकों से मिस्टेक!
मोदी जी ने इसीलिए तो कपड़ों से पहचानने की बात कही थी। इस हिंदुस्तान में न नाम से पहचान पर पक्का भरोसा कर सकते हैं‚ न शक्ल–सूरत से पहचान पर। खान–पान से पहचान पर भी नहीं। बस कपड़ों से ही पहचान में नो–मिस्टेक। फिर भी हिंदू हित में सरकार इतना तो कर ही सकती है कि हिंदुओं के मुसलमानों जैसे नाम रखने पर पाबंदी लगा दे। न चौधरी का नाम नसीब होगा और न बेचारा बुलडोजर मिस्टेक करेगा!
(व्यंग्यकार वरिष्ठ पत्रकार और ‘लोकलहर’ के संपादक हैं।)