
एस सी अधिकारियों कर्मचारियों को हडकने बाली चर्चा में सिमटी डी एच एस की बैठक
एटा। जिले के मुख्य चिकित्सा अधिकारी अपनी मनमानी कार्यशैली एवम नियम विरुद्ध क्रिया कलापों से विभाग के चर्चित मामलों में बैक फुट पर आने के कारण अब विषय से हट कर अनर्गल प्रलाप करने लगे है जिससे स्वास्थ विभाग की जिला स्तरीय बैठकों की गरिमा गिर रही है। पूरे विभाग में एस सी विरोधी उत्पीड़नात्मक मामलों की भरमार है। जिनमे कई मामलों में इन्हें अपने मनमाने आदेशों पर मुंह की खानी पड़ी है। पिछले शनिवार को जिला स्वास्थ समिति की डीएम सभागार में हुई बैठक में हद तो उस समय हो गई जब मुख्य विकास अधिकारी की अध्यक्षता में चल रही बैठक के दौरान निर्धारित एजेंडे पर चर्चा कम करके मेडिकल कालेज के सी एम एस डी सुरेश चन्द्र जो जिले में विगत चौदह वर्षों से प्रख्यात फिजिशिन के रूप में सी एम ओ के समकक्ष पद संभाले हुए हैं उन्हें नीचा दिखाने के लिए संदर्भहीन चर्चा करने लगे। स्मरण रहे डा चंद्रा अनुसूचित जाति से संबद्ध अधिकारी हैं। उक्त बैठक में मौजूद सूत्रों के अनुसार नियमानुसा स्वास्थ समिति में उनसे (सी एम एस ) से संबंधित कोई विषय नही था। अनर्गल प्रलाप की इस कड़ी में सी ई ओ अपनी असफलताओं का ठीकरा सी एम एस पर फोड़ते रहे। उक्त बैठक में मौजूद सूत्रों के हवाले से बताया गया है जब सी एम एस ने प्रतिवाद करना चाहा तो अध्यक्षीय अधिकारी सी डी ओ ने चुप रहने के लिए कह दिया। स्मरण रहे सी एम ओ डा उमेश कुमार त्रिपाठी अक्सर सबंधित बैठक के विषय से हट कर चर्चा कर एस सी अधिकारी कर्मचारियों को निशाना बनाते रहे है। जिससे मामलों में जिला प्रशासन को अपने फैसले बदलने पड़े है तीन अगस्त की ऐसी बैठक में इसी रवैए से इन्होंने अनुसूचित जाति की सी एच ओ बरखा के विरुद्ध जिलाधिकारी से आदेश करा लिया जिस पर बाद में जिलाधिकारी ने अपने खुद के आदेश को 13 अगस्त को पुनः आदेश कर पिछला आदेश रद्द करना पड़ा। सुविज्ञ सूत्र कहते है कि स्वास्थ समिति की जिला स्तरीय बैठक में एन एच एम से संबंधित कार्य योजना एवं बजट आदि पर चर्चा और अनुमोदन एवं समीक्षा होती है पर सी एम ओ इन बिंदुओं पर कम कर्मचारी अधिकारियों के उत्पीड़न के मामलों को फोकस करते रहते हैं । जिससे विभाग में कार्यरत इस वर्ग में रोष पनप गया।
क्या सी एम ओ एस सी विरोधी है?
अपनी एस सी विरोधी छवि के साथ जिला चला रहे सी एम ओ यह भूल गए है अधिकारी को किसी जातिगत पूर्वाग्रह में बंध का काम नही करना चाहिए। बताया गया है अन्य कार्यक्रमों पर चर्चा और निर्देश के लिए विभाग में नियमित नैठके होती रहती है जहां मुख्य चिकित्सा अधिकारी कास्ट बेस टारगेट बना कर मौखिक लिखित उत्पीड़न कर रहे है जिन पर कई बार उच्चाधिकारियों सहित कोर्ट ने आदेश पारित किए है।
असल में निरंतर कई मामलों में बैक फुट पर आए मुख्य चिकित्सा अधिकारी बौखला गए ही बैठको की गरिमा भूल कर अनर्गल प्रलाप पर उतर आए है।
इधर आय से अधिक संपत्ति,तीन साल के भीतर हुए तमाम भ्रष्टाचार के मामले पर केंद्रीय प्रदेश की जांच एजेंसीज को शिकायते भेजी गई है जिनकी भनक लगते ही अपनी तेजी तुर्की दिखा कर अनर्गल प्रलाप से जिला स्तरीय प्रशासनिक अफसरों को भ्रमित किया जा रहा है।
असल में सी एम ओ की यह सब कोशिशें जरी खसम पे, लरिकन मारे की कहावत चरितार्थ करती है क्यों कि उन्हे ज्ञात है उनके अनियमित कियाकलाप के विरुद्ध माइक्रो आब्जर्वर एक्टिविस्ट लगे हुए जिनका यह कुछ नही बिगाड़ पा रहे इस लिए अपने अधीनस्थ कर्मियो अधिकारियों पर रौब झाड़ रहे हैं।
अनुसूचित जाति वर्ग के संगठनों में खास तौर पर मुख्य चिकित्सा अधिकारी की एस सी विरोधी नीति को लेकर खासे गुस्साए तेवर हैं। अब देखना जिला प्रशासन दिनो दिन बैठको की गिर रही गरिमा के लिए क्या प्रयास करता है ?