
यूक्रेन से चीन तक चुभती रही चुनौती
बीतते साल 2022 में भारत ने यूक्रेन युद्ध से उत्पन्न समस्याओं को तो अच्छी तरह संभाल लिया, लेकिन चीन के मोर्चे पर उसे उतनी सफलता नहीं मिल सकी
साल 2022 में भारत की विदेश और सामरिक नीतियों को कई गंभीर चुनौतियों से जूझना पड़ा। इन मुश्किलों की शुरुआत फरवरी में रूस के यूक्रेन पर आक्रमण के साथ हुई। बेशक, रूस से हमारे संबंध लगभग दो दशकों से नरम पड़ते जा रहे थे, लेकिन रक्षा क्षेत्र में वह आज भी हमारे लिए विशेष स्थान रखता है। हमारी सेनाएं पारंपरिक और आधुनिक युद्ध सामग्रियां अभी तक रूस से लेती रही हैं। असैन्य परमाणु व अंतरिक्ष के क्षेत्र में भी उसका महत्व छिपा नहीं है। हालांकि, पूर्वी यूरोप में नाटो के विस्तार के कारण भारत को रूस के प्रति कुछ सहानुभूति थी, और समय-समय पर उसने संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में अपनी इस भावना को खुलकर व्यक्त भी किया है, लेकिन यूक्रेन आक्रमण अंतरराष्ट्रीय नियमों का इतना बड़ा उल्लंघन था कि भारत उसको नजरंदाज नहीं कर सकता था। मगर हमें अपने रक्षा-हितों की भी सुरक्षा करनी थी। नतीजतन, हमने उचित नीति अपनाई, जिसके तहत यह मांग की गई कि यूक्रेन मसले का हल शांतिपूर्ण बातचीत व राजनय के जरिये खोजना होगा।
भारत ने न ही किसी वक्तव्य में और न ही संयुक्त राष्ट्र की सुरक्षा परिषद या आम सभा में रूस के खिलाफ प्रस्तावों का साथ दिया, लेकिन बड़ी खूबसूरती से यह भी साफ कर दिया कि वह इस हमले से खुश नहीं है। मोदी सरकार की एक और कुशलता यह रही कि युद्ध शुरू होते ही वह यूक्रेन से भारतीय नागरिकों, विशेषकर विद्यार्थियों को सुरक्षित स्वदेश वापस ले आई। इस युद्ध से वैश्विक आपूर्ति शृंखला प्रभावित हुई है, जिस कारण दुनिया भर में खाद्यान्न और ऊर्जा संकट गहरा गया है। इसका तत्काल समाधान आवश्यक है, क्योंकि इसका असर दुनिया के गरीब देशों पर ज्यादा पड़ रहा है।
भारत ने यूक्रेन युद्ध से उत्पन्न समस्याओं को तो राजनयिक रूप से अच्छी तरह संभाल लिया, लेकिन चीन के मोर्चे पर उसे उतनी सफलता नहीं मिल सकी। हर रूप में चीन हमारे लिए सबसे बड़ी चुनौती है। 1962 की जंग में हमें बेशक नुकसान हुआ था, पर पांच दशक पहले दोनों देशों की क्षमताएं कमोबेश समान थीं। 1980 के दशक के बाद चीन के उत्थान ने फासला इतना बढ़ा दिया कि आज उसकी अर्थव्यवस्था हमसे छह गुना ज्यादा हो गई है। शी जिनपिंग के नेतृत्व में चीन एक ऐसा राष्ट्र बनना चाहता है, जो अमेरिका को हर क्षेत्र में चुनौती दे सके।
2020 में वास्तविक नियंत्रण रेखा पर हुई झड़पों के बाद से ही यह साफ हो गया था कि चीन की मंशा भारत पर दबाव बनाए रखने की है। अब यह भी स्पष्ट है कि वह हमारे पड़ोसी देशों के साथ रिश्ते आगे बढ़ाकर हमारे हितों पर चोट करना चाहता है। हालांकि, चीन और भारत के बीच राजनय और सैन्य स्तर की बातचीत भी जारी है, जिससे कुछ सफलताएं मिली हैं। मगर 2020 में चीन ने वास्तविक नियंत्रण रेखा पर जो कदम आगे बढ़ाए, उससे पीछे हटने को तैयार नहीं दिखता। यह मामला काफी नाजुक है, और इसी कारण केंद्र सरकार ने संसद में इस पर बहस की इजाजत नहीं दी।
दुखद है कि चीन का रुख तो नकारात्मक है, लेकिन मैन्युफैक्चरिंग, यानी विनिर्माण पर हमारी सरकार द्वारा जोर देने के बावजूद हमारी निर्भरता उस पर इतनी है कि हमारा आयात लगातार बढ़ रहा है। इस दृष्टि से देखें, तो चीन की चुनौती से पार पाने के लिए हमारी सरकार को राजनीतिक, सामरिक और औद्योगिक वर्गों को एक करना होगा। तभी चीन की बरअक्स हम खड़े हो सकेंगे। दुर्भाग्य से, इस दिशा में जो उचित कदम उठाने चाहिए, उनका अभाव दिख रहा है। तवांग की हालिया घटना से भी यह जाहिर होता है।
कोविड महामारी और यूक्रेन युद्ध की वजह से इस साल भारत के कई पड़ोसी देशों, विशेषकर श्रीलंका की आर्थिक और राजनीतिक स्थिति चरमरा गई, जिसके दुष्परिणाम हम पर भी पड़ सकते थे। मगर केंद्र सरकार ने न सिर्फ कोलंबो को मदद पहुंचाई, बल्कि परदे के पीछे से राजनीतिक हल भी वहां के नेताओं को समझाया। देखा जाए, तो पूरे साल भारत के पड़ोस में उथल-पुथल जारी रही। पाकिस्तान तो अपनी आंतरिक समस्याओं से जूझता ही रहा, कश्मीर का राग भी अलापता रहा। सबसे अधिक खेद की बात तो यह रही कि उसके विदेश मंत्री बिलावल भुट्टो ने हमारे प्रधानमंत्री के खिलाफ ऐसे अल्फाज निकाले, जिसे न तो किसी भारतीय को भूलना चाहिए, और न ही भुट्टो को इसके लिए माफ करना चाहिए। हालांकि, यह अच्छा रहा कि फरवरी, 2021 के संघर्ष-विराम के फैसले को पाकिस्तान ने अंतरराष्ट्रीय सीमा-रेखा पर कायम रखा, लेकिन उसने इस बाबत कोई संकेत नहीं दिया कि वह आतंकवाद का दामना छोड़ेगा। इसीलिए, भारत की यह नीति कि जब तक पाकिस्तान आतंकवाद के प्रति अपना रुख नहीं बदलेगा, तब तक आपसी रिश्ते सामान्य नहीं हो सकेंगे, पूरी तरह से उचित है।
रही बात अफगानिस्तान की, तो वहां भारत ने अपनी ‘टेक्निकल टीम’ भेजी, जिसमें राजनयिक भी शामिल थे, लेकिन बेहतर होता कि भारत अपनी अफगान वीजा नीति में कुछ ढील देता। तालिबान को राजनयिक मान्यता देने का तो सवाल नहीं है, पर उनकी सरकार काबुल में बन चुकी है, जिसे नजरंदाज करना ठीक नहीं होगा। अपने हितों की रक्षा हर देश करता है, और हमें भी इस दिशा में गंभीर होना चाहिए। हां, नेपाल पर भी नजर बनाए रखने की जरूरत है। वहां की आंतरिक स्थिति अब भी नाजुक है, हालांकि चुनावों के बाद पुष्पकमल दाहाल प्रचंड के नेतृत्व में गठबंधन की सरकार बन चुकी है।
यह सुखद है कि 1 दिसंबर को भारत जी-20 का अध्यक्ष बना। ऐसे समय में, जब विश्व कई तरह की चुनौतियों से जूझ रहा है, भारत यही चाहता है कि विकासशील व विकसित देशों के बीच की खाई कम की जाए। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की इस अपील पर तमाम देशों को उनका साथ देना चाहिए। हालांकि, इसमें यह भी आवश्यक है कि सरकार सभी राजनीतिक पार्टियों को साथ लेकर चले। जी-20 की अध्यक्षता चुनौती भरी तो होगी, पर इसमें यदि हमें सफलता मिली, तो इसके दूरगामी अच्छे परिणाम सामने आएंगे।
हर देश की सफल विदेश और सामरिक नीति की बुनियाद सामाजिक और राजनीतिक एकता होती है। इसमें आर्थिक विकास का भी अपना विशेष योगदान होता है। ऐसे में, जरूरी यही है कि हम पीछे की तरफ न देखें, और अपनी नजर अर्जुन की तरह सिर्फ भविष्य की चुनौतियों पर रखें।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)