*मोटे अनाजों की पैदावार से समृद्ध होंगे छोटे किसान, रिपोर्ट योगेश मुदगल

जब से केंद्र में भारतीय जनता पार्टी की सरकार आई है और नरेंद्र मोदी देश के प्रधानमंत्री बने हैं, तब से सरकार का हर कदम गांव, गरीब और किसान के कल्याण के प्रति समर्पित रहा है। किसान शुरू से ही प्रधानमंत्री की प्राथमिकता में सबसे ऊपर रहे हैं। उन्होंने किसानों के कल्याण और उनकी आमदनी को दोगुना करने के उद्देश्य से कई परिवर्तनकारी योजनाएं शुरू की। इसी दिशा में छोटे और गरीब किसानों के सशक्तिकरण की दिशा में एक और कदम उठाते हुए उन्होंने अब मिलेट्स, यानी मोटे अनाज को बढ़ावा देने का बीड़ा उठाया है। मिलेट्स को महत्व दिलाने के लिए 2018 को उन्होंने ‘मोटा अनाज वर्ष’ घोषित किया था। साथ ही, मोटे अनाज को देश के पोषण मिशन अभियान में भी शामिल किया। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के अथक प्रयासों के बल पर ही संयुक्त राष्ट्र साल 2023 को ‘अंतरराष्ट्रीय मिलेट्स वर्ष’ के रूप में मना रहा है। मिलेट्स को हर थाली में पहुंचाने के अभियान से सबसे अधिक फायदा देश के छोटे व गरीब किसानों को होगा। यह उनकी तकदीर बदलने और आय बढ़ाने में व्यापक रूप से लाभकारी सिद्ध होगा।
मोटे अनाज सदियों से हमारे नियमित भोजन का हिस्सा
हालांकि, 20वीं सदी में चावल और गेहूं की लोकप्रियता ने इनकी लोकप्रियता को कम कर दिया था, लेकिन अब ये अनाज तेजी से लोगों की पसंद बन रहे हैं। स्वयं प्रधानमंत्री के भोजन में मिलेट्स नियमित रूप से शामिल रहते हैं। 2023 को मिलेट्स वर्ष की पहचान देने की पहल के तहत 20 दिसंबर को सरकार ने सांसदों के लिए एक लंच का आयोजन भी किया था, जिसमें मोटे अनाज से बने भोजन मीनू का हिस्सा थे। अंतरराष्ट्रीय मिलेट्स वर्ष में यह तय किया गया है कि भारत की अध्यक्षता में देश में होने वाली जी-20 की बैठकों में मिलेट्स के व्यंजन भी परोसे जाएंगे। प्रधानमंत्री अपने ‘मन की बात’ कार्यक्रम में मोटे अनाजों के प्रति लोगों में जागरूकता बढ़ाने के लिए जन-आंदोलन चलाने की बार-बार बात करते हैं। भारत में जब कोई विदेशी मेहमान अथवा राष्ट्राध्यक्ष आते हैं, तो प्रधानमंत्री की कोशिश रहती है कि उन्हें परोसे जाने वाले व्यंजनों में मिलेट्स से बने व्यंजन भी शामिल हों। यह प्रयोग काफी सफल रहा है।
मिलेट्स खाद्य सुरक्षा की दृष्टि से भी काफी महत्वपूर्ण हैं। पूरी दुनिया में जलवायु परिवर्तन के कारण सूखे की समस्या लगातार बढ़ रही है। भूजल का स्तर भी तेजी से नीचे गिरता जा रहा है। ऐसे में, यह समय की मांग है कि ऐसे फसलों को बढ़ावा मिले, जो पोषक तत्वों से भरपूर हों और जिन्हें उगाने में पानी की खपत भी कम हो। साथ ही, मिट्टी की उर्वरा शक्ति भी बनी रहे। मोटे अनाज गेहूं और चावल पर देश की निर्भरता कम करने में भी सहायक होंगे। ये प्रधानमंत्री के प्राकृतिक खेती को बढ़ावा देने के अभियान में भी मददगार सिद्ध होंगे, क्योंकि इन फसलों में कीड़े कम लगते हैं, जिससे किसानों पर कीटनाशकों का दबाव कम होता है। इस तरह से किसानों की उत्पादन-लागत भी कम होगी।
मिलेट्स सुपर फूड्स
क्योंकि इनमें मिनरल्स, फाइबर्स और पोषक तत्व अपेक्षाकृत काफी अधिक मात्रा में होते हैं। ऐसे में, देश में आठ करोड़ मधुमेह के मरीजों और लगभग 35 लाख कुपोषित बच्चों के लिए ये अनाज काफी फायदेमंद साबित होंगे। अगर आप सुबह की शुरुआत मिलेट्स से करते हैं, तो कई बीमारियों से बच सकते हैं। इसके सेवन से मोटापा, पाचन की समस्या, कोलेस्ट्रॉल और मधुमेह संबंधी दिक्कतें कम होती हैं। यही वजह है कि इन अनाजों को थाली में जगह देना अनिवार्य हो गया है। भारत ने 2021-22 में इससे पिछले वर्ष की तुलना में बाजरा उत्पादन में 27 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज कराई है। वैश्विक उत्पादन में लगभग 41 प्रतिशत की अनुमानित हिस्सेदारी के साथ भारत दुनिया में बाजरा के अग्रणी उत्पादकों में से एक है। सरकार के प्रयासों से मोटे अनाजों के उपयोगी प्रसंस्करण और फसल चक्र के बेहतर इस्तेमाल के साथ इसे खाद्य सामग्री का अहम अंग बनाने में मदद मिलेगी। आजादी के अमृत काल में हमें मोटे अनाज को अधिक से अधिक अपनाने का प्रयास करना चाहिए, ताकि आत्मनिर्भर भारत, स्वस्थ भारत, स्वस्थ मिट्टी और खुशहाल किसान का सपना साकार हो सके।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)