प्रेम से बंद दरवाजे भी खुल जाते हैं*ओशो

प्रेम से बंद दरवाजे भी खुल जाते हैं*

हम जब तक प्रेम में होते हैं, तो हमें सब तरफ सुंदरता दिखाई देती है। जैसे ही हम समझदार होने लगते हैं, हम सुंदरता को खोने लगते हैं। हम लोगों को प्रेम करना नहीं, बल्कि उससे सावधान रहना सिखाते हैं, जबकि यही प्रेम जीवन के, परमात्मा से मिलने के बंद दरवाजों को खोलने की चाभी है।

प्रेम से बंद दरवाजे भी खुल जाते हैं
हर बच्चा पैदा होता है प्रेम को लेकर, इसीलिए तो हर बच्चा प्यारा लगता है। लेकिन धीरे-धीरे कहीं कुछ गड़बड़ हो जाती है। हर बच्चा प्यारा लगता है। हर बच्चा सुंदर है। तुमने कोई कुरूप बच्चा देखा? बच्चे का सौंदर्य जैसे उसके शरीर पर नहीं, बल्कि किसी भीतरी क्षमता पर निर्भर है।

गर मुझसे पूछो, तो भूल जाओ परमात्मा को, भूल जाओ सत्य को। तुम सिर्फ प्रेम को खोजो और शेष सब उसके पीछे चला आएगा। परमात्मा ऐसे बंधा चला आता है प्रेम के पीछे, जैसे छाया तुम्हारे पीछे बंधी चली आती है। लेकिन प्रेम के बिना तुम कुछ भी खोजो, कुछ भी न पा सकोगे, क्योंकि पाने वाला संवेदनशील ही नहीं है। पाने वाले के पास क्षमता और पात्रता नहीं है। पाने वाला बेहोश है… घृणा में, क्रोध में, वैमनस्य में, पाने वाला जहर में दबा है। प्रेम के अमृत से पुलक आएगी।

हर बच्चा पैदा होता है प्रेम को लेकर, इसीलिए तो हर बच्चा प्यारा लगता है। लेकिन, धीरे-धीरे कहीं कुछ गड़बड़ हो जाती है। हर बच्चा प्यारा लगता है। हर बच्चा सुंदर है। तुमने कोई कुरूप बच्चा देखा? बच्चे का सौंदर्य जैसे उसके शरीर पर नहीं, बल्कि किसी भीतरी क्षमता पर निर्भर है। बच्चे का दीया अभी जल रहा है। अभी उसके रोएं-रोएं से चारों तरफ से प्रेम की रोशनी पड़ती है। अभी वह जिस तरफ देखता है, वहीं प्रेम है। पर जैसे-जैसे बड़ा होगा, वैसे-वैसे प्रेम खोने लगेगा। हम सहायता करते हैं कि प्रेम खो जाए। हम उसे प्रेम करना नहीं सिखाते, प्रेम से सावधान रहना सिखाते हैं…क्योंकि प्रेम बहुत खतरनाक है।

हम बच्चे को सिखाते हैं…संदेह करना, क्योंकि इस दुनिया में संदेह की जरूरत है, नहीं तो लोग लूट लेंगे। धोखाधड़ी है, बेईमानी है, प्रपंच है…अगर तुम संदेह न कर सके तो कोई भी तुम्हें लूट लेगा। चारों तरफ लुटेरे हैं। हम चारों तरफ के परमात्मा का ध्यान नहीं रखते। हम चारों तरफ के लुटेरों का ध्यान रखते हैं। हम लुटेरों के लिए तैयार करते हैंबच्चों को, तो लुटेरों के लिए तैयार करना हो तो प्रेम नहीं सिखाया जा सकता, क्योंकि प्रेम खतरनाक है।

प्रेम का अर्थ है—भरोसा। प्रेम का अर्थ है—श्रद्धा। प्रेम का अर्थ है—स्वीकार। संदेह का अर्थ है—होश रखो, कोई लूट न ले, बचाओ अपने को, सदा तत्पर रहो। आक्रमण होने को है कहीं-न-कहीं से और इसके पहले कि आक्रमण हो, तुम खुद आक्रमण कर दो, क्योंकि वही रक्षा का सबसे उचित उपाय है। तो, प्रतिपल जैसे संतरी पहरे पर खड़ा हो, ऐसे हम बच्चों को तैयार करते हैं, तभी हम बच्चे को कहते हैं कि प्रौढ़ हुआ। जब उसकी प्रेम की क्षमता पूरी खो जाती है, जब वह चारों तरफ शत्रु को देखने लगता है, मित्र उसे कहीं भी नहीं दिखाई पड़ता, जब अपने पिता पर भी संदेह करता है…तभी हम समझ पाते हैं कि अब वह योग्य हुआ। दुनिया में जाने योग्य हुआ। अब बचपना न रहा। अब इसे कोई धोखा न दे सके गा। अब यह दूसरों को धोखा देगा। कबीर ने कहा है कि तुम धोखा खा लेना, लेकिन धोखा मत देना, क्योंकि धोखा खा लेने से कुछ भी नहीं खोता है। धोखा देने से सब कुछ खो जाता है।

किस सब कुछ की बात करते हैंकबीर? क्योंकि जैसे-जैसे तुम धोखा देते हो, वैसे-वैसे तुम्हारे प्रेम की क्षमता खो जाती है। कै से तुम प्रेम करोगे, अगर तुम धोखा देते हो। और अगर तुम डरे हुए हो, तो भय तो जहर है, प्रेम का फूल खिल न पाएगा। अगर तुम डरे हुए हो, तो तुम प्रेम कै से करोगे? भय से कहीं प्रेम उपजा है? भय से तो घृणा उपजती है। भय से तो शत्रुता उपजती है। भय से तो तुम अपनी सुरक्षा में लग जाते हो।

पूरे जीवन, जैसे-जैसे बच्चा बड़ा होता है, वैसे-वैसे सुरक्षा करता है…धन से, मकान से, व्यवस्था से, सब तरफ से इंतजाम करता है कि कहीं से कोई हमला न हो जाए। लेकिन इसी इंतजाम में हम भूल जाते हैं कि सब द्वार बंद हो जाते हैं और प्रेम के आने का रास्ता भी अवरुद्ध हो जाता है। सुरक्षा पूरी हो जाती है, लेकिन सुरक्षा ही कब्र बन जाती है।

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निशाकांत शर्मा (सहसंपादक)

यह खबर /लेख मेरे ( निशाकांत शर्मा ) द्वारा प्रकाशित किया गया है इस खबर के सम्बंधित किसी भी वाद - विवाद के लिए में खुद जिम्मेदार होंगा

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