
आ अब लौट चले पारम्परिक खेती की ओर – राजू आर्य*
एटा – भारतीयों किसानों की जमीनें अधिक उपजाऊ बनाने हेतु भारत में पिछले कई वर्षों से चल रही रसायनिक खाद पर आधारित खेती जो कि मानबीय मूल्यों के विपरीत असर डालती,तब हमे उत्पादन के लिए प्रयोग की जानी बाली जैविक खेती की ओर ध्यान कराना आवश्यक हो जाता है , जिससे हमारे भारतीय किसानो को पुनः अपनी परम्परिक खेती पर जोर देना होगा।
पारम्परिक खेती से जो अन्न मिलता है वह बगैर रसायन के होता है,इससे हमारे जीवन पर अनुकूल प्रभाव पड़ता है जबकि रसायनिक खेती से प्रतिकूल असर होता है, अतः हमे पुराने क्रिया कलापो को अपनाकर जहरीले रसायनो की अपेक्षा जैविक खाद बीज अपनाना चाहिए, जिससे जन, जीवन व मानवीयता बच सके।
इसलिए हम लोगों को,विशेष तौर से अन्नदाता से अपील करते हैं, अपनी पारम्परिक खेती की ओर लौटे,एवं जहरीली खेती को बंद करे।
इसलिए जैविक खाद बीज एवं पारम्परिक खेती के लिए निम्न सुझावों पर ध्यान देना होगा,जिससे पुनः देश अग्रणी पंक्ति में खड़ा हो सके।
जैविक खेती करने के लिए निम्न सुझाव
जैविक खेती करने से भूमि की उपजाऊ क्षमता में वृद्धि हो जाती है ।
जैविक खेती से सिंचाई अन्तराल में वृद्धि होती है । रासायनिक खाद पर निर्भरता कम होने से लागत में कमी आती है ।
बाजारों में जैविक उत्पादों की माँग में वृद्धि होने से किसानों की आय में भी वृद्धि होती है ।
जैविक खेती करने से भूमि , जल और वायु प्रदूषण बहुत कम होता है ।
जैविक कृषि में किसी भी प्रकार के रासायनिक पदार्थों व कीटनाशकों एवं कैमिकल- फर्टीलाइजर्स का प्रयोग नहीं होता है ।
जैविक खेती करने पर पौष्टिक व जहरमुक्त भोजन का उत्पादन होता है ।
जैविक कृषि से उत्पादित खाद्य पदार्थों का स्वाद भी नियमित रूप से उपजे खाद्य वस्तुओं से बेहतर होता है ।
जैविक कृषि से खाद्य वस्तुओं में कई प्रकार के विटामिन प्राप्त होते हैं ।
जैविक कृषि से उपजने वाली वस्तु ( चारा ) से पशुओं के दुग्ध उत्पादन क्षमता में वृद्धि होती है ।
जैविक खेती से मिट्टी के पोषण को बढ़ावा मिलता है तथा मिट्टी की उर्वरता में सुधार होता है ।
जैविक खेती से ग्रामीण क्षेत्रों में बेरोजगारों को रोजगार के भी कई अवसर प्रदान करता है , जिससे किसानों एवं मजदूरों की आर्थिक स्थिति को सुधारा जा सकता।
जैविक कृषि पर्यावरण के अनुकूल होती है । साथ ही Reduce , Reuse व Recycle को भी बढ़ावा मिलता है ।
जैविक खेती में आधुनिक मशीनों के प्रयोग के बजाय मानवीय श्रम की आवश्यकता अधिक रहती है ।
जैविक कृषि में गोबर की खाद , कम्पोस्ट , जीवाणु खाद , फसलोन के अवशेष एवं प्रकृति में उपलब्ध विभिन्न प्रकार के खनिज पदार्थों से पौधों की पोषक तत्व की क्षमता में वृद्धि होती है ।
जैविक कृषि से उत्पन्न अनाज के सेवन से किसी भी मानवीय बीमारी से ग्रसित होने का खतरा नहीं रहता है ।