आज बहुत जरूरी है पत्रकार सुरक्षा कानून की–
आखिर सहने की कितनी हद होनी चाहिये-

#आज बहुत जरूरी है पत्रकार सुरक्षा कानून की–
आखिर सहने की कितनी हद होनी चाहिये-
मै पत्रकारों पर हो रहे अत्याचारों की बात कर रही हूँ सत्य लिखना मतलब मौत को आमंत्रित करने के समान हो रहा है आजके बदलते परिवेश मे उसपर पत्रकारों के साथ शासन, प्रशासन की नाइन्साफ़ी कहने को चौथा स्तंभ है हम,पर सुरक्षा, रोजी रोटी, सम्मान, की द्रष्टि से भीड़ मे गुम है,तब मै सभी पत्रकार भाई और बहनों से कहना चाहती हूँ कि जिला स्तर पर हमे पत्रकार सुरक्षा कानून की मांग करनी चाहिये ग्यापन के द्वारा ताकि हम पत्रकार अपनी जान, भविष्य,अधिकार,के लिये कानून तक बात पहुंचाने मे असुविधा महसूस ना कर सके, आज के दौर मे अपने उशूलो और अधिकारों के लिये हमे लड़ना ही पड़ेगा, यह सोचकर कि माँ से ज्यादा इंसान के लिये कोई शुभ चिंतक नहीं है पर बच्चा जबतक भूँख से रोता नहीं है तो वह भी नहीं समझती पाती हैकि बच्चे को— बात कटु सत्य है जो मै लिख रही हूँ कि पत्रकार परिवार की ताकत एकता का बटवारा आज सत्य को बहुत दर्द दे रहा है उसका सीधा फायदा उन हस्तियों को मिल रहा है जिनसे हमे खबरें निकालनी होती है,पर अफसोस कि हम कलम को लिफापा मै रखकर खबरों का अंतिम संस्कार तो वही कर आते है जहां से पत्रकारिता होनी चाहिये थी लेकिन कुछभी तो नही ठहरता है बदलना तो नियत मे सुमार है साहिब आदमी तो उसका गुलाम है।
लेखिका, पत्रकार, दीप्ति चौहान।

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निशाकांत शर्मा (सहसंपादक)

यह खबर /लेख मेरे ( निशाकांत शर्मा ) द्वारा प्रकाशित किया गया है इस खबर के सम्बंधित किसी भी वाद - विवाद के लिए में खुद जिम्मेदार होंगा

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