
शिक्षा के व्यवसायी करण एवं भारत मे मंहगी शिक्षा फीस होने की बजह से विदेशों में पढ़ने जाते हैं छात्र।
प्राइवेट स्कूलों पर ली जाने वाली अवैध फीसों पर लगाम लगाए सरकार।
विदेशों में भारतीय छात्रों को उच्च शिक्षा के लिए जाने का मुख्य कारण हैं, भारत मे शिक्षा का व्यवसायी करण, यदि भारत सरकार देश कुकरमुत्तों की तरह उगने वाले शिक्षा संस्थानों पर अवैध रूप से ली जाने वाली फीसों पर लगाम कस दे तो हमारे देश के छात्रों को विदेश पढ़ने के लिए नहीं जाना पड़े।भारत मे उच्च शिक्षा के लिए नालन्दा, तक्षशिला जैसे शिक्षण संस्थान थे जिसके शिक्षा के उच्च स्तरीय पाठ्यक्रम और बेहतर शिक्षकों के रहते देश के छात्रों के साथ-साथ विदेशों से भी छात्र यहां शिक्षा के लिए आते थे।आजादी के बाद से देश मे बनी सरकार के नुमाइंदे रहीसी में पले बड़े हुए थे,जिनकी शिक्षा भी विदेशों में हुई थी,उन्होंने कभी नही चाहा कि देश का युवा पढ़ लिखकर देश की आंतरिक व्यवस्थाओं में हस्तक्षेप करे, वर्तमान में मेडिकल,इंजीनियरिंग आदि की शिक्षा भारत मे इतनी महंगी हो गई है, जिसके परिणाम स्वरूप देश का गरीब बच्चा पढ़ाई करने की रुचि तो रखता है, परन्तु महंगी फीस के कारण आगे नहीं पढ़ पाता,देश में जितने भी मीडिया संस्थान हैं, उनको वेबजह की डिबेटो की जगह शिक्षा क्षेत्र की डिवेटे कराकर उच्च स्तरीय विद्वानों के माध्यम से देश के युवाओं की शिक्षा के लिए कदम उठाने के लिए सरकारों पर दबाव बनाना चाहिए।मैंने देखा है देश के अंदर चलने वाले मेडिकल कॉलेजों के प्रबंध समिति को जिनके परिवार के ही अशिक्षित परिजन बड़े ही रौब से कालेज चला रहे हैं।हमारे देश में खुले मांटेसरी स्कूलों के हाल तो और भी बहुत खराब हैं,यहाँ बच्चों के पाठ्यक्रम को हर वर्ष बदल कर अभिवाककों से हजारों रुपया बसूले जाते हैं।आज हर गली मोहल्ले में ऐसे स्कूलों की भरमार देखी जा सकती है, स्थानीय शिक्षा के विभागीय अधिकारियों पैसे के लालच में तुरन्त ऐसे स्कूलों को मान्यता देने में जरा भी देर नहीं लगाते।आजादी के बाद से ही जितनी सरकारें बनी उन्होंने शिक्षा क्षेत्र के बुनियादी मुद्दों पर ध्यान न देकर जनता को सिर्फ वोट की राजनीति तक सीमित रखने का ही काम किया,शिक्षा के बारे में सरकार की नीतियों के विषय मे किसी सरकार ने नहीं सोचा जिसके परिणाम स्वरूप भारतीय छात्रों को विदेशों में पढ़ने जाने के लिए मजबूर होना पड़ता है।वर्तमान सरकार को पूर्व की सरकारों के नियमों को नजरअंदाज कर देश के भविष्य युवाओं की बेहतर शिक्षा के लिए मेडिकल, आईआईटी, इंजीनियरिंग,की पढ़ाई के लिए शिक्षा की गुणबत्ता के साथ सस्ती फीस पर ध्यान देने की आवश्यकता है, जिससे आज यूक्रेन,रूस आदि देशों में हमारे देश के युवाओं को सिर्फ सस्ती शिक्षा के कारण पढ़ने जाना पड़े,और विषम परिस्थितियों में उनको जान के लाले पड़े और उनके साथ उनके परिवार में त्राहि-त्राहि मचे।मेरा केंद्र सरकार और राज्य सरकारों से निवेदन है कि वो अपने अपने स्तर से देश के प्रदेश के छात्रों के भविष्य को उज्ज्वल बनाने के लिए देश अंदर ही बेहतर शिक्षा और सस्ती फीस का निर्धारण करके देश को मजबूती प्रदान करने में युवाओं के मनोबल की बढ़ाने का कदम उठाये,इजराइल एक ऐसा देश है, जहां चाहे राष्ट्रपति का बच्चा हो या एक छोटे स्तर के नागरिक का बच्चा हो उसे बेहतर शिक्षा के साथ देश की सेना का अभिन्न अंग बनना ही है, यह वहां का कानून है, आज यूक्रेन में युद्व की भयानकता के चलते वहां हर नागरिक,महिलाओं, बच्चों को हथियार उठाने की जरूरत आन पड़ी है, उसके विपरीत हमारे देश के हजारों छात्रों को वहां युद्ध की बजह से अपनी जान के लाले पड़ रहे हैं, उनके परिजन लगातार अपने बच्चों की सलामती के साथ भारत सरकार से बच्चों को सुरक्षित लाने के लिए गुहार लगा रही है, वर्तमान सरकार यूक्रेन में फंसे छात्रों को बिल्कुल मुफ्त लाने के लिए पूरी तन्मयता से जुटी है, और केंद्र सरकार के तमाम मंत्री यूक्रेन की सीमा के देशों के लिए रवाना कर दिए गए हैं यूक्रेन में फंसे छात्रों को सुरक्षित लाने के लिए।इस संकट की घड़ी में भी हमारे देश के विपक्षी नेता केंद्र सरकार पर तोहमत लगा रहे हैं, कि कि यूक्रेन में फंसे छात्रों से दोगुना किराया बसूला जा रहा है, जबकि सरकार अपने देश के छात्रों को बिल्कुल मुफ्त सुरक्षित लाने के लिए कटिबद्ध नजर आ रही है।बहुत ही शर्म की बात है, कि जब हमारे देश के युवा यूक्रेन में जिंदगी और मौत के मुँह में फंसे हैं, और अपनी सलामती के लिए भारत सरकार से विनती कर रहे उसके बाबजूद यहां यहाँ के विपक्षी अपनी ओछी राजनीति के चलते जनता को गुमराह करने की कोशिश में लगे हैं। संकट की घड़ी में देश के हर नागरिक का धर्म बनता है, कि वह देश की अस्मिता और अखंडता की रक्षा के लिए आपसी भेदभाव भुलाकर एकजुटता का परिचय दे,यही राष्ट्रभक्ति का परिचायक है।