( “प्रेम ” -कोई पाश नही है । यह बांधता भी है और खोलता भी है । यह श्रृंगार है ,तो विरह भी है । प्रेम देह भी है और आत्मा भी । यह लौकिक भी है , अलौकिक भी । प्रेम राधा भी है और कृष्ण भी ………प्रेम के विभिन्न आयाम को कहती कहानी —-“तुम मिलने आओगी न ! “)
—डॉ निरूपमा वर्मा —-
तुम मिलने आओगी न
प्रिय मानसी ,
“प्रिय “शब्द मैं बहुत मुश्किल से बटोर पाया हूँ , और उस से भी ज्यादा मुश्किल से अंकित कर पाया हूँ । कल ही तुमको एक ख़त लिखा था । आज फिर लिखना चाह रहा हूँ । शायद लिखना नहीं ,बातें करना चाहता हूँ । और बातोँ के लिए ख़त से ज्यादा अच्छा माध्यम कोई नहीं होता ।
मैंने कभी अपनी जिंदगी में खूबसूरत पत्नी की कल्पना नहीं की — और न ही खूब धुली पुंछी की। मैं आज अपनी सारी बौद्धिकता और भावुकता के बीच से एक निष्कर्ष पर पहुंचा हूँ कि जिंदगी में यदि मैं किसी से जुड़ सकता हूँ तो एकदम निपट अपढ़ और गांव की लड़की से – या फिर एकदम तार्किक से । बीच की लड़कियों के साथ जिंदगी नहीं काट सकता । तुम दूसरे सिरे पर ठहरती हो — तार्किक । क्योंकि तुम जो भी कहती हो तर्क के साथ , आत्म विश्वास के साथ ।
तुम बिना स्पर्श के मेरे भीतर उतर आयी थीं। पर कितनी तकलीफ हो रही है , ये सोच के कि मैं तुम्हें अपने साथ नहीं ला सका था। तुम मुझे पलायनवादी कहती हो । तुम से दूर भागना पलायनवाद नहीं है , बल्कि खुद से लड़ना है । मानसी मैं अपने लिए तुम्हारे मुँह से पलायनवादी नहीं सुनना चाहता था । यदि मैं पलायनवादी होता तो अभी तक कब का आत्महत्या कर चुका होता । तकलीफों से बहुत बरसों से लड़ रहा हूँ ,और तकलीफों से लड़ते – लड़ते हालत यह हो गई कि सुख की कल्पना डराती है । –मैं किसे दोष दूँ ? वक्त को –इस समाज को –या किस्मत को ? मानसी मैं ने ‘नीत्शे ‘ को पढ़ा है । मैं उसके दर्शन -उसकी फिलॉसफी का पोषक नहीं , मगर इन दिनों इतना अधिक सोचने लगा हूँ कि डर लगता है नीत्शे की तरह पागल हो कर मर न जाऊं । मेरे लिए यही सोच काफी है कि एक लड़की –जो निश्चय साधारण थी,मगर भीतर से उसने मुझे असाधारण ढंग से चाहा था ।किसी का ऐसा चाहना कितना सुख देता तुम नहीं समझोगी । उस दिन तुम मुझे डरपोक , कायर ,पलायनवादी ,और जाने क्या क्या साबित करने की कोशिश में थीं । तुम शायद मुझ से नाराज थीं-होना भी चाहिए । तुम मुझे हमेशा एक बच्ची की तरह लगी हो । बच्चों की खूबी होती है वे कुछ नहीं छिपा पाते । न प्यार – न गुस्सा ।उनको छू दो तो स्पर्श में भी उनकी नाराजगी ,उनका प्यार बरामद कर सकते हैं । मानसी ,मैंने तुम्हें कभी छुआ नहीं, किन्तु तुम्हारी आवाज और लहजे को छू लिया था ,जिसमें नाराज़गी बज रही थी –सिक्के की तरह ।
तुम्हें पता है , हंसने और लगातार हँसते रहने के लिए लाखों खुशियाँ कम होती है ,मगर एक गम उम्र भर रुलाने के लिए काफी होते हैँ । वह गम तुम्हें अपनाने से होता। उन दिनों मुझे ये महसूस हुआ तब मैं एक सुकून भरी मौत भी हासिल नहीं कर पाता ।
सच मानसी , तुम्हें इतना अधिक याद कर के कभी भी ख़त नहीं लिखा जितना आज लिखा है । तुम मेरी जिंदगी में बहुत अहम हैसियत से आयी थीं । मैं बिखरे निर्णयों वाला रेतीला आदमी हूँ । तुमने इस रेत को बटोर कर टीला बनाने की कोशिश की –ताकि वक्त ,उम्र वा जिंदगी के रेगिस्तान में तुम गर्म हवाओं से बचने के लिए अपनी गर्दन छुपा सको (शतुरमुर्ग की तरह ?) । किन्तु मैं तुम्हें अपने रेगिस्तान में खींच कर नहीं ला सकता था ।
तुम मेरी जिंदगी की तलाश हो ,मानसी । फिर भी तुम्हे अपने से दूर जाने को कह दिया था –” खुश हो कर अन्यत्र शादी कर लो ! वक्त रफ्ता रफ्ता सारी चीजों को व्यवस्थित कर देता है ।” ऐसी बात कहते हुए मैं भीतर तक टूट गया था उस दिन मानसी !! कितनी तकलीफ जदा बात है ,मानसी डियर कि हम जिसकी तलाश में जिंदगी भर भागें , उसके नजदीक पहुँच कर लौटने के लिए मजबूर हों । जैसे मैं लौटा था तुम्हारे पास से ।
अब मैं सचमुच तुम से मिल कर रोना चाहता हूँ । पर अब आँखों में आंसू भी नहीं आते ।
मैं अपने जीवन के अंतिम समय में तुमसे मिलना चाहता हूं । इसलिए एक बार फिर तुम्हारे पुराने शहर आया हूँ । जानता हूँ तुम अब इस शहर में नहीं हो । इसलिए तुम्हे बुलाने के लिए खत लिख रहा हूँ , । जाने क्यों एक बार या शायद अंतिम बार तुमसे मिलने की लालसा तुम्हारे शहर तक खींच लाई ।
क्या तुम मुझसे मिलने आओगी मानसी । बिल्कुल उसी तरह – जब अपनी शादी की तारीख बताने आई थीं । उसी गुलमोहर की छांव में , कानो में झूलते बड़े झुमके, लम्बे घने बालों को बेतरतीब से बांध के , चेहरे पर उड़ती बालों की लट के साथ , आंसू से भरी आंखों में उसी काजल के साथ , सिसकती हिचकी के साथ , अपने दबे जज्बातों के साथ , मेरी कायरता के झूठे वादों को बिसरा कर , एक पैर में पहने पायल के साथ –