छठ” । मूलत: सूर्य का यह पर्व षष्ठी तिथि मे आने के कारण इसे “सूर्य षष्ठी” अथवा अपभ्रंश रूप मे “छठ” कहा गया है

लेख:- सूर्य षष्ठी (छठ पूजा), भाग-1

छठ पूजा- 10.11. 2021, बुधवार
सूर्योदय समय छठ पूजा के दिन:- 6:40 am
सूर्यास्त समय छठ पूजा के दिन:- 5:30 pm

षष्ठी तिथि प्रारम्भ:- 9.11.2021, 10:36 am
षष्ठी तिथि समाप्त – 10.11.2021, 8:26 am

भारत में वर्ष भर अनेकों पर्व तथा त्यौहार मनाये जाते हैं, इन्ही मे से सूर्य की उपासना के लिए एक मुख्य पर्व है, “छठ” । मूलत: सूर्य का यह पर्व षष्ठी तिथि मे आने के कारण इसे “सूर्य षष्ठी” अथवा अपभ्रंश रूप मे “छठ” कहा गया है ।

यह पर्व एक वर्ष में दो बार मनाया जाता है । पहला चैत्र मास (मार्च) में और दूसरी बार कार्तिक मास (नवम्बर) में । चैत्र शुक्ल पक्ष की षष्ठी तिथि पर मनाए जाने वाले छठ पर्व को “चैती छठ” व कार्तिक शुक्ल पक्ष षष्ठी पर मनाए जाने वाले पर्व को “कार्तिकी छठ” कहा जाता है। यह पर्व दिवाली के 6 दिन बाद मनाया जाता है। यह पर्व मुख्य रूप से उत्तर भारत के राज्य बिहार, झारखंड और पूर्वी उत्तर प्रदेश में बड़े ही धूमधाम से मनाया जाता है।

हिन्दु धर्म के महान ऋषियों-मुनियों ने लोक कल्याणार्थ वर्ष भर पर्वो व त्यौहारों का एक ऐसा सुनियोजित कार्यक्रम रचाया, जिससे प्रत्येक त्यौहार के पीछे वैज्ञानिक आधार, आध्यात्मिक, नैतिक तथा समाजिक दृढता को बल मिला ।

सूर्य षष्ठी (छठ पर्व) का वैज्ञानिक दृष्टिकोण:-

छठ पर्व की परंपरा में भी गहन विज्ञान समाया है, षष्ठी तिथि (छठ) एक विशेष खगोलीय अवसर है । उस समय सूर्य की पराबैगनी किरणें (ultra violet rays) पृथ्वी की सतह पर सामान्य से अधिक यानि हानिकारक मात्रा में एकत्र हो जाती हैं। उसके संभावित कुप्रभावों से मानव की यथा संभव रक्षा करने का सामर्थ्य इस परंपरा में है । पर्व को मनाने से सूर्य के प्रकाश यानि पराबैगनी किरण के हानिकारक प्रभाव से पृथ्वी पर रहने वाले प्राणियों की रक्षा संभव है। पृथ्वी के प्राणियों को इस पूजन से बहुत लाभ मिलता है।

सूर्य के प्रकाश के साथ उसकी पराबैगनी किरण भी चंद्रमा और पृथ्वी पर आती हैं। सूर्य का प्रकाश जब पृथ्वी पर पहुंचता है, तो पहले उसे वायुमंडल मिलता है । वायुमंडल में प्रवेश करने पर उसे आयन मंडल मिलता है। पराबैगनी किरणों का उपयोग कर वायुमंडल अपने ऑक्सीजन तत्त्व को संश्लेषित कर उसे उसके एलोट्रोप ओजोन में बदल देता है। इस क्रिया द्वारा सूर्य की पराबैगनी किरणों का अधिकांश भाग पृथ्वी के वायुमंडल में ही अवशोषित हो जाता है । पृथ्वी की सतह पर केवल उसका नगण्य भाग ही पहुंच पाता है। सामान्य अवस्था में पृथ्वी की सतह पर पहुंचने वाली पराबैगनी किरणो की मात्रा मनुष्यों या जीवों के सहन करने की सीमा में होती है। अत: सामान्य अवस्था में मनुष्यों पर उसका कोई विशेष हानिकारक प्रभाव नहीं पडता, बल्कि उसकी धूप द्वारा हानिकारक कीटाणु मर जाते हैं, जिससे मनुष्य या जीवन को लाभ ही होता है।

छठ जैसी खगौलीय स्थिति मे (चंद्रमा और पृथ्वी के भ्रमण तलों की सम रेखा के दोनों छोरों पर) सूर्य की पराबैगनी किरणें, कुछ चंद्र सतह से परावर्तित तथा कुछ गोलीय अपवर्तित होती हुई, पृथ्वी पर पुन: सामान्य से अधिक मात्रा में पहुंच जाती हैं।

वायुमंडल के स्तरों से आवर्तित होती हुई, सूर्यास्त तथा सूर्योदय को यह और भी सघन हो जाती है । ज्योतिषीय गणना के अनुसार यह घटना कार्तिक तथा चैत्र मास की अमावस्या के छ: दिन उपरांत अर्थात षष्ठी तिथि को आती है। अतः इन्ही दिनो मे इस पर्व को मनाये जाने की वजह से इन पराबैंगनी किरणों से त्यौहार मनाने वाले भक्तों तथा पृथ्वी के अन्य प्राणियों अर्थात जीवन की रक्षा संभव हो पाती है।

ज्योतिषीय गणना पर आधारित होने के कारण इसका नाम और कुछ नहीं, बल्कि छठ पर्व ही रखा गया है।

सूर्य षष्ठी (छठ) पूजा की विधि:-
छठ पर्व चार दिनों का होता है। भैयादूज के तीसरे दिन अर्थात कार्तिक शुक्लपक्ष की चतुर्थी तिथि से यह आरंभ होता है। इस पूजा में पवित्रता का ध्यान रखा जाता है; लहसुन तथा प्याज वर्ज्य है। जिन घरों में यह पूजा होती है, वहां भक्तिगीत गाए जाते हैं।

छठ उत्सव का मुख्य अवयव छठ व्रत है, जोकि एक कठिन व्रत माना जाता है। यह व्रत मुख्यतः महिलाओं द्वारा किया जाता है, किंतु कुछ पुरुष भी यह व्रत रखते हैं।

व्रत रखने वाली महिला को परवैतिन भी कहा जाता है। चार दिनों के इस व्रत में व्रती को लगातार उपवास करना होता है। भोजन के साथ-२ भक्त को जमीन पर ही सोना होता है, तथा पर्व के लिए बनाए गए कमरे में व्रती फर्श पर एक कंबल या चादर के सहारे ही रात बिताई जाती है। इस उत्सव में शामिल होने वाले लोग नए कपड़े पहनते हैं, परंतु व्रती ऐसे कपड़े पहनते हैं, जिनमें किसी प्रकार की सिलाई नहीं की होती। महिलाएं साड़ी और पुरुष धोती पहनकर छठ करते हैं। एक बार यह पर्व शुरू करने के बाद छठ पर्व को सालोंसाल तब तक करना होता है, जब तक कि अगली पीढ़ी की किसी विवाहित महिला को इसके लिए तैयार न कर लिया जाए। घर में किसी की मृत्यु हो जाने पर यह पर्व नहीं मनाया जाता है।’

1. पहला दिन: नहाय-खाय
छठ पूजा का प्रारंभ कार्तिक शुक्ल चतुर्थी तिथि से होती है। यह छठ पूजा का पहला दिन होता है, इस दिन नहाय खाय होता है।

सर्वप्रथम घर की साफ-सफाई कर उसे पवित्र बना लिया जाता है। इसके पश्चात छठव्रती स्नान कर पवित्र तरीके से बने शुद्ध शाकाहारी भोजन, जोकि सैंधा नमक, घी से बना हुआ अरवा चावल और कद्दू की सब्जी प्रसाद के रूप में ग्रहण कर व्रत की शुरुआत करते हैं। घर के सभी सदस्य व्रती के भोजन करने के उपरांत ही भोजन ग्रहण करते हैं।

इस वर्ष नहाय-खाय 8 नवंबर, दिन सोमवार को है। इस दिन सूर्योदय सुबह 06:39 बजे और सूर्योस्त शाम को 05:31 पर होगा।

2. दूसरा दिन: लोहंडा और खरना
लोहंडा और खरना छठ पूजा का दूसरा दिन होता है। यह कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि को होता है। इस दिन से उपवास आरंभ होता है। इस दिन रात में खीर बनती है। व्रती रात में यह प्रसाद ग्रहण हैं।

खरना का प्रसाद लेने के लिए आस-पास के सभी लोगों को निमंत्रित किया जाता है। प्रसाद के रूप में गन्ने के रस में बने हुए चावल की खीर के साथ दूध, चावल का पिट्ठा और घी चुपड़ी रोटी बनाई जाती है। इसमें नमक या चीनी का उपयोग नहीं किया जाता है।

इस वर्ष लोहंडा और खरना 9 नवंबर दिन मंगलवार को है। इस दिन सूर्योदय सुबह 06:40 बजे पर होगा और सूर्योस्त शाम को 05:30 पर होगा।

3. तीसरा दिन: छठ पूजा, सन्ध्या अर्घ्य
छठ पूजा का मुख्य दिन कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की षष्ठी तिथि होती है। इस दिन ही छठ पूजा होती है। इस दिन शाम को सूर्य को अर्घ्य दिया जाता है।
तीसरे दिन कार्तिक शुक्ल षष्ठी को दिन में छठ प्रसाद बनाया जाता है। प्रसाद के रूप में ठेकुआ, जिसे कुछ क्षेत्रों में टिकरी भी कहते हैं, के अलावा चावल के लड्डू, जिसे लड़ुआ भी कहा जाता है, बनाते हैं। इसके अलावा चढ़ावा के रूप में लाया गया साँचा और फल भी छठ प्रसाद के रूप में शामिल होता है।

शाम को पूरी तैयारी और व्यवस्था कर बाँस की टोकरी में अर्घ्य का सूप सजाया जाता है और व्रती के साथ परिवार तथा पड़ोस के सारे लोग अस्ताचलगामी सूर्य को अर्घ्य देने घाट की ओर चल पड़ते हैं। सभी छठव्रती एक नीयत तालाब या नदी किनारे इकट्ठा होकर सामूहिक रूप से अर्घ्य दान संपन्न करते हैं। सूर्य को जल और दूध का अर्घ्य दिया जाता है तथा छठी मैया की प्रसाद भरे सूप से पूजा की जाती है। इस दौरान कुछ घंटे के लिए मेले का दृश्य बन जाता है।

इस वर्ष छठ पूजा 10 नवंबर को है। इस दिन सूर्यादय 06:40 बजे पर होगा और सूर्योस्त 05:30 बजे होना है। छठ पूजा के लिए षष्ठी तिथि का प्रारम्भ 9 नवबंर को 10:36 am से हो रहा है, जो 10 नवंबर को 8:26 am तक है।

4. चौथा दिन: सूर्योदय अर्घ्य, पारण का दिन
छठ पूजा का अंतिम दिन कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की सप्तमी तिथि होती है। इस दिन सूर्योदय के समय सूर्य देव को अर्घ्य अर्पित किया जाता है। उसके बाद पारण कर व्रत को पूरा किया जाता है।

चौथे दिन छठ पूजा से पहले पूजा के लिए निम्नलिखित सामग्री को पहले ही तैयार कर ली जाती है और फिर सूर्य देव को विधि विधान से अर्घ्य दिया जाता है।

  1. बांस की 3 बड़ी टोकरी, बांस या पीतल के बने 3 सूप, थाली, दूध और गिलास ।
    2. चावल, लाल सिंदूर, दीपक, नारियल, हल्दी, गन्ना, सुथनी, सब्जी और शकरकंदी ।
  2. नाशपती, बड़ा नींबू, शहद, पान, साबुत सुपारी, कैराव, कपूर, चंदन और मिठाई ।
  3. प्रसाद के रूप में ठेकुआ, मालपुआ, खीर-पुड़ी, सूजी का हलवा, चावल के बने लड्डू ।

अर्घ्य विधि:- बांस की टोकरी में उपरोक्त सामग्री रखी जाती है । सूर्य को अर्घ्य देते समय सारा प्रसाद सूप में रखकर और सूप में ही दीपक जलाया जाता है । फिर जल में उतरकर सूर्य देव को श्रद्धा पूर्वक अर्घ्य दिया जाता है।

इस समय व्रती वहीं पुनः इक्ट्ठा होते हैं जहाँ उन्होंने एक दिन पहले शाम को अर्घ्य दिया था। पुनः पिछले शाम की प्रक्रिया की पुनरावृत्ति होती है। अंत में व्रती कच्चे दूध का शरबत पीकर तथा थोड़ा प्रसाद खाकर व्रत पूर्ण करते हैं।

कार्तिक शुक्ल सप्तमी (11 नवंबर) की सुबह उदियमान सूर्य को अर्घ्य दिया जाता है। व्रती वहीं पुनः इक्ट्ठा होते हैं जहाँ उन्होंने शाम को अर्घ्य दिया था। पुनः पिछले शाम की प्रक्रिया की पुनरावृत्ति होती है। अंत में व्रती कच्चे दूध का शरबत पीकर और थोड़ा प्रसाद खाकर व्रत को पूरा करते हैं, जिसे पारण या परना कहा जाता है।

इस वर्ष छठ पूजा का सूर्योदय अर्घ्य तथा पारण 11 नवंबर को होगा। इस दिन सूर्योदय सुबह 06:41 बजे तथा सूर्योस्त शाम को 05:29 बजे होगा।

(क्रमशः)

जय श्रीराधे
आज का पंचांग,????????????
सोमवार,8.11.2021
श्री संवत 2078
शक संवत् 1943
सूर्य अयन- दक्षिणायन, गोल-दक्षिण गोल
ऋतुः- हेमन्त ऋतुः ।
मास- कार्तिक मास।
पक्ष- शुक्ल पक्ष ।
तिथि- चतुर्थी तिथि 1:17 pm तक
चंद्रराशि- चंद्र धनु राशि मे 9:04 pm तक तदोपरान्त धनु राशि।
नक्षत्र- मूल नक्षत्र 6:49 pm तक
योग- सुकर्मा योग 3:26 pm तक (शुभ है)
करण- विष्टि करण 1:18 pm तक
सूर्योदय 6:39 am, सूर्यास्त 5:31 pm
अभिजित् नक्षत्र- 11:42 am से 12:26 pm
राहुकाल – 7:59 am से 9:21 am (शुभ कार्य वर्जित,दिल्ली )*
*दिशाशूल- पूर्व दिशा ।

नवंबर शुभ दिन:- 8 (दोपहर 1 उपरांत), 9, 10, 12, 13, 15, 16, 18 (दोपहर 12 तक), 20, 21, 22 (सवेरे 9 तक), 23, 24, 25, 26 (सायंकाल 5 उपरांत), 28, 29 (सायंकाल 5 तक), 30

नवम्बर अशुभ दिन:-  11, 14, 17, 19, 27

भद्रा :- नवम्बर 8, सोमवार को 02:46 am भद्रा अंत नवम्बर 8, सोमवार को 01:16 pm भद्रा मे मुण्डन, गृहारंभ, गृहप्रवेश, विवाह, रक्षाबंधन आदि शुभ काम नही करने चाहिये , लेकिन भद्रा मे स्त्री प्रसंग, यज्ञ, तीर्थस्नान, आपरेशन, मुकद्दमा, आग लगाना, काटना, जानवर संबंधी काम किए जा सकतें है ।

गंडमूल:- (ज्येष्ठा)नवम्बर 6, 2021, शनिवार  को  11:39 pm-गण्ड मूल अन्त नवम्बर 8, 2021, सोमवार को 06:49 pm (मूल) तक रहेगें। गंडमूल नक्षत्रों मे जन्म लेने वाले बच्चो का मूलशांति पूजन आवश्यक है।

रवि योग :- नवम्बर 7, रविवार 9:05 pm से 6:38  pm, नवम्बर 08 यह एक शुभ योग है, इसमे किए गये दान-पुण्य, नौकरी  या सरकारी नौकरी को join करने जैसे कायों मे शुभ परिणाम मिलते है । यह योग, इस समय चल रहे, अन्य बुरे योगो को भी प्रभावहीन करता है।


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निशाकांत शर्मा (सहसंपादक)

यह खबर /लेख मेरे ( निशाकांत शर्मा ) द्वारा प्रकाशित किया गया है इस खबर के सम्बंधित किसी भी वाद - विवाद के लिए में खुद जिम्मेदार होंगा

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