
गाड़ियों में जीप जितनी कोई भी गाड़ी पसंद नहीं है। यह पसंद सिनेमा के पर्दे से ही ज़हन का हिस्सा बनी है। विल्ली की जीप के बिना सबकुछ अधूरा ही लगा। बाद में यह सपना अपग्रेड होकर जिप्सी का हो गया लेकिन तभी जिप्सी और जीप जीवन में आने से रह गई। खुली जीप की सवारी का आनंद मिला है लेकिन चलाते हुए कहीं खो जाने का नहीं।
मेरे कई दोस्त पैसे वाले हुए। सबने एक से एक कार ख़रीदी मगर किसी ने जीप या जिप्सी नहीं ख़रीदी। पोर्श, बीएमडब्ल्यू, मर्सेडिज़ और न जाने क्या क्या। हाड़तोड़ मेहनत करके उन मित्रों ने सबसे अच्छी कारें ख़रीद डाली, काश एक जीप ख़रीद लेते। इसलिए जब वे अपनी कार देने की पेशकश करते हैं कि ले जाओ, चला लो, मैं मना कर देता। उनके पास जीप होती तो ले भी आता।ये शौक की गाड़ी है। इतनी जगह नहीं और न इतना पैसा कि एक कार के अलावा आप जीप भी रख लें। कोई नहीं। अब तो उम्र भी नहीं रही और न सर पर बाल कि चश्मा लगाकर स्टाइल में जीप चलाने का लुत्फ़ लिया जाए। लिखने का मतलब नहीं कि अफसोस हो रहा है। इसलिए लिख रहा हूं कि कुछ गुदगुदा रहा है। एक जीप हमेशा मेरी कल्पनाओं के कोने में पार्क रहती है। एक इंसान कई सपनों का मारा होता है। सपने भी तो बादलों की तरह आते हैं और बिना बरसे चले जाते हैं।
बहरहाल, चितचोर का यह गाना कितना सुंदर है। यह गाना तब से अच्छा लगता है जब न मनचाहा साथी मिला था और न हम किसी को मिले थे! गाने में सुनसान सड़कों को नापती जीप में सारे लोग आगे ही बैठे हैं। जीप के शीशे पर पेड़ की छाया और दो छोर पर अलग अलग सपना देख रहे दो लोग। अमोल पालेकर। तब लगता था जीवन में अमोल पालेकर होना सबसे अच्छा है। सहज, सरल, सस्ता और सुविधाजनक। आज के स्टार की हालत देखकर समझ भी आया कि अमोल पालेकर होना कितना मुश्किल है।
ख़ैर इस गाने को सुनिए। जीवन में मौक़ा मिले तो संगीत का कोई वाद्य सीख लीजिए। मैं चूक गया। पर संगीत आना चाहिए। डांस भी।
@रवीश कुमार ,NDTV India