क्रांतिकारी महावीर सिंह राठौर ने जनपद एटा का नाम रोशन किया

*क्रांतिकारी महावीर सिंह राठौर ने जनपद एटा का नाम रोशन किया* ~देश की आजादी में अलीगंज क्षेत्र का ग्राम शाहपुर टहला एक क्रांतिकारी के बलिदान~ एटा: देश की आजादी में अलीगंज क्षेत्र का ग्राम शाहपुर टहला एक क्रांतिकारी के बलिदान ने धन्य कर दिया। यहां जन्मे युवा क्रांतिकारी महावीर सिंह राठौर ने छात्रजीवन से ही क्रांतिकारियों के संपर्क में आकर पढ़ाई लिखाई छोड़ भगत सिंह राजगुरु जैसे बड़े क्रांतिकारियों का साथ दिया। लाहौर हाईकोर्ट ट्रिब्यूनल ने 7 अक्टूबर 1930 को भगत सिंह, राजगुरु, सुखदेव सहित जिन सात क्रांतिकारियों को आजन्म कारावास की सजा सुनाई, उसमें महावीर सिंह का नाम भी शामिल था। जिस क्रांतिकारी ने मद्रास की बेलारी जेल में जड़ता और कठोरता का परिचय दिया तो नंगे शरीर पर बैतों की मार के बीच खून के जमीन पर गिरते कतरे और मांस के लोथड़े भी उसकी राह न बदल सके। अंत में अंडमान की काले पानी की सेल्यूलर जेल में पहुंचाया गया। जहां अंग्रेजों ने जो सितम किया वह इतना दुखद था कि इस देशभक्त को अपनी जमीं पर भी दो गज जमीन न मिली। ऐसा देशभक्त जिले का गौरव ही नहीं, बल्कि युवा पीढ़ी के लिए आज भी प्रेरणा बना है। *खून में बसा था देश प्रेम* शहीद महावीर सिंह का जन्म 16 सितंबर सन् 1904 को एटा जिले के शाहपुर टहला ग्राम में क्षत्रिय परिवार में हुआ था। इनके पिता का नाम कुंवर देवी सिंह तथा माता शारदा देवी धार्मिक वृत्ति के थे। पिता की देश भक्ति भावना तथा माता की भक्ति भाव प्रेरणा ने महावीर को भी देशप्रेम खून के साथ दिया था। *पहले गांधीवादी फिर बने क्रांतिकारी* 1924 में कासगंज के स्कूल में पढ़ाई के दौरान अंग्रेजों की अमन सभा में महावीर से न रहा गया और अंग्रेजों के समक्ष महात्मा गांधी की जय बोलकर अपना विरोध जताकर सभी को हैरान कर दिया। बढ़ती उम्र के साथ वह अंग्रेजों के विरुद्ध क्रांतिकारी बनकर वतन की आजादी को जुट गए। महावीर सिंह 1925 में डीएवी कालेज कानपुर पढ़ने पहुंचे, जहां भगत सिंह, चंद्रशेखर आजाद आदि से मिल गये। जिसके बाद मिशन कार्य से पंजाब, उत्तर प्रदेश तथा अन्य प्रदेशों में क्रांतिकारियों के साथ रहे। क्रांतिकारी मिशन को धन की आवश्यकता पर पंजाब नेशनल बैंक लूटने की योजना बनायी। लाला लाजपत राय की बर्बरता पूर्ण हत्या के अपमान का बदला अंग्रेज अधिकारी साडर्स को मारकर लिया। महावीर सिंह इन कार्यो में आगे रहे। *अफसोस न लौट सके वतन* लाहौर षड़यंत्र केस में सजा पाने के बाद सन् 1933 में उन्हें अंडमान की जेल में भेज दिया गया, जहां अंग्रेजों के जुल्म से महावीर सिंह का फैफड़ा फट गया और मां का यह सपूत अंडमान की उस काल कोठरी में शहीद हो गया। जेल के दानवों ने पार्थिव शरीर रात्रि के अंधकार में अबरडीन सागर में फेंक दिया। जिसके बाद सपूत का दुर्भाग्य ही था कि भारत माता की माटी में नहीं मिल सका।

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निशाकांत शर्मा (सहसंपादक)

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