इस ईद पर दूसरों के ग़म में शरीक हों…..

ईद आती है तो अपने साथ खुशियों की सौगात लाती है। इत्र में भीगे नए कपड़े, सेवइयों की महक, बिरयानी की खुशबू, मेले, चहल पहल, मेहमान नवाजी और बड़ों से मिलने वाली ईदी का खजाना, रमजान की सख्त इबादत के बदले अल्लाह तआला की तरफ से तोहफा मालूम देता है। लेकिन इस बार की ईद थोड़ा मुख्तलिफ है।
इस बार हर तरफ मौत का खौफ पसरा हुआ है। हम में से ज्यादातर ने किसी न किसी अपने को बीते एक महीने में खो दिया है। हजारों लोग अभी भी अस्पतालों में जिंदगी और मौत के बीच संघर्ष कर रहे हैं। लाखों लोग बीमारी से ठीक तो हो गए हैं लेकिन सेहत खराब हो चुकी है। कारोबार चौपट हो गए हैं। नौकरियों पर खतरा मंडरा रहा है। बीमारी ने जमा पूंजी को खा लिया है। हर तरफ आंसू, सिसकियां, तकलीफ और रंज का आलम है। अल्लाह तआला से लोग रहम की भीख मांग रहे हैं। ऐसे में जो लोग इस नामुराद बीमारी से बच गए हैं । उन्हें खुदा का शुक्र अदा करना चाहिए।
बेशक ईद खुशियों का त्योहार है । लेकिन क्या ऐसे माहौल में ये मुनासिब होगा कि हम नए कपड़े बनाएं ?? पकवानों से दस्तरखान सजाएं ?? दावतों पर जाएं और मेहमान नवाजी करें। बाजार में कपड़े, रेडीमेड, जूते चप्पल की दुकानों के आधे शटर उठे हुए है । और मुसलमान मर्द और औरतें खरीदारी में मसरूफ है। दुकानें पूरी तरह से भरी हुई है । किसी को न तो मास्क की फिक्र है , और न ही बीमारी का डर। ये बड़ा अफसोसनाक मंजर है। ऐसे ही वाकए कुछ पुराने लखनऊ और कानपुर में देखने को आए हैं। क्या एक ईद हम सादगी से नहीं मना सकते ?? क्या जब हर तरफ रंज और ग़म का माहौल हो तो ये मुनासिब होगा कि हम अपनी खुशियों का भोंडा दिखावा करें।
ये वक्त है दूसरों के ग़म को बांटने का। किसी जरूरतमंद की मदद करने का। किसी की तकलीफ को समझने का। बिना मज़हब, जात, ऊंच नीच देखे , आपसे जो बन पाए करिए। कुछ नहीं तो दुआ करिए। सदका, फितरा, जकात के अलावा भी अगर आप कुछ कर सकते हों तो करिए। पड़ोसी, रिश्तेदार, अहबाब, दोस्त हर एक को अहसास कराएं कि इस मुश्किल दौर में वोह खुद को अकेला मत समझे। ये वक्त इम्तेहान का है । और सिर्फ एकजुट होकर और एक दूसरे की मदद करके ही हम इस मुश्किल वक्त का सामना कर पाएंगे। अल्लाह तआला हम सबकी इबादतों को कुबूल फरमाए । और इस मुबारक रमज़ान के महीने की बरकत से इस वबा से पूरी दुनियां के इंसानों को छुटकारा दिलाए । ताकि अगली ईद हम उसी जोश व खरोश से मना सकें , जैसे हमेशा से मनाते आए हैं। ,,,, आमीन ।