देखते-देखते धरती के पुत्र भी ब्यापारी बन गये—

#यूपीएटा,
देखते-देखते धरती के पुत्र भी ब्यापारी बन गये—
आज हमारे पास प्रकृति के सवालों के जबाब नहीं है,पर आदमी-आदमी की साँसें चुराकर भी कालाबाजारी कर रहा है,और दोषी मोदी और योगी है,क्या खूब मौका मिला है चमकने का, ये तबाही का तूफान जब गुजर जाए अगर शेष इंसानियत रह जाए तो ढूंढ लेना कि इस तबाही का जिम्मेदार आखिर कौन है,हवा के हमकदम कौन चल पाया है,आज प्रकृति हंसती है हमारे आँशुऔं पर हरे भरे जंगल आज रेगिस्तान बना दिये, शहर गांव चौपालों से हरियाली चुराली नंगी जमीन के सीने पर दरारें प्यास से मुंह फैलाये सूखे कंठ की तढप और आसमान से बरषते अंगारों से तिलतिल झुलस रही है,पक्षियों के झुँड बेघर हो गये जंगल से जानवर, बेछतों की छांव ये दरख्त क्या उजड़े जैसे माता, पिता,का हाथ और सहारा उजड़ गया हो,घरों के सीनेपर ऊँची-ऊँची हवेलियों मे इन मकानों मे न आँगन है न मुडेर दम घुटती संसाधनों की इन जेलों मे आग उगलते आदमी पैसे की जिंदा मशीन बन गये,जिंदा आदमियों मे मुर्दों का साक्षात आम होने लगा,कच्चे घरौंदो मे पलते मासूम इंसान देखते-देखते-पत्थर हो गये,क्या होगा एसी चिकनी भीड़का जिसमे ना दर्द ठहरता है न दुआएं,सिर्फ शिक्को की आवाज सुनते है,हमे आज वह गरीबी बहुत याद आ रही है,४रोटियों को 8इंसान खाकर भूँख को मात देदेते थे,हर भोर खुशहाल थी हर दिन आवाद,साम एक आँचल मे सिमटने को बेकरार होती थी,भोर जब ख्वाबों मे जकड़ लेती थी तो माकी उंगलियों का स्पर्श हर साँस को खुशहाल पिता का मीठा चुम्बन माँथेपर किस्मत को मंजिलें सुझा जाता था,
धीरे-धीरे नीयतों के झोके कब तूफान बन गये,
उडा़कर चैनोअमन हमारा हमसे जीने का सामान ले गये,,
बदलते परिवेश का इंसान,जिसमे शिक्को की भूँख, लहूकी प्यास,दूसरों के अधिकारों की चाहत की चाह रखता है,
फिर क्यों डरे और सहमे है हम ये सोचकर कि हमे पालने बाली प्रकृति आज क्यों मौत बन गई,इसके गुनहगार हम इस हकीकत को जहर समझकर संकल्प के साथ पीलें तो आने बाले भविष्य की साँसों मे ओक्सीजन और दवा की जरूरत हमे नहीं पड़ेगी सोचो पूर्व के उस समाज मे न कोई डोक्टर होता था न कोई बीमार और बीमारी एक दूसरे के प्यार, और प्रेम, की दवा प्रकृति की हवाऔ से छन छनकर हमारे साँसों को ताजा रखती थी,धरती पुत्र तब धरती पर अन्न पैदा करते थे,आज बदलाव हर जगह है देखते देखते यह पुत्र भी ब्यापारी हो गये प्रकृति की खोख को असमय छेड़कर अन्न को निकालने लगे ,इंसान के निवालों मे जहर घोलकर बीमारियां कौन देरहा है, आज इन्हें धरती का पुत्र कहने मे जुवां संकुचाने लगी है,सवाल प्रकृति के अनगिनत है अपनी तबाही के पर हमारे पास इसके जबाब ही नहीं है सिवाय आँशुऔं के इसका प्रकोप कम करने का एक ही रास्ता है अपने गुनाहों का—–इसे फिरसे आबाद करने का संकल्प हम इंसान ले,वरना इसकी इंसाफ की झाडू़ तले निर्दोष भी—
लेखिक

पत्रकार, , यूपी, एटा।

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निशाकांत शर्मा (सहसंपादक)

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