हम तो कोरा कागज लिये बैठेथे,

हमतोकोराकागजलियेबैठेथे,

निकम्मेदिलकीख्वाहिशेंलिखनेको,

कलमजमानेकादर्देआईनाउठालाई,,

इस राष्ट्रीय आपदा मे बाल से खाल निकालने का बक्त नहीं है हमारे पास, एक दूसरे के साथ और सहयोग की जरूरत है,उसी तर्ज पर कि एक अकेला थक जाएगा मिलकर बोझ उठाना, सही मायनों मे इस बक्त हमारी राजनीति और इंसानियत का इम्तिहान है,जो प्रकृति ले रही है हम धीरे- धीरे बहुत गुनाह कर लेते है और भूल जाते है लेकिन प्रकृति के पास एक-एक हमारे कर्म का हिसाब होता है ,यह अदृश्य शक्ति चाहे तो हमें रात और दिन में अर्स से फर्स, और फर्स से अर्स,तक पहुंचा सकती है, क्यों कि इंसान और प्रकृति का कोई मुकाबिला नहीं है तब हम इंसानों के पास शिवाय पश्चाताप केऔर एक जुटता और सहयोग की बहुत आवश्यकता है जान है,तो जहान है,वरना सबकुछ जहां से कमाया है वही रह जाना है,तब पुनः फिर एक सार्थक अनुरोध की अपील है,कि इतने बड़े मानव गुलिस्तां मे कोई तढपकर संसाधनों के अभाव मे दुनियां से—-लड़ने झगड़ने और शिकवे शिकायतों का भी एक खुशनुमा माहोल होना जरूरी है—-
साँस-साँस पर है मौत का पहरा,
आओ दुआओं से कुछ दौलत कमाले,

भूँखे रात और दिन है,ये भोर और साम की नफरतों से,
आओ दुआएं जिंदगी कमालें,,

चिताओं की दहकती आग ने,आँखों की नमी सुखा दी,
आओना इस तस्वीर को पलटकर,खुशनुमा बर्षात कमालें,,

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निशाकांत शर्मा (सहसंपादक)

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