भारत की हर बेटी के जीवन में शिक्षा का दीप जले-स्वामी चिदानन्द सरस्वती

सावित्रीबाई फुले की 190 वीं जयंती पर विशेष

आधुनिक नारीवादी एक्टिविस्ट जो स्वंय शिक्षित हुई और दूसरों के जीवन में भी शिक्षा का दीप जलाया ऐसी महान विभूति की समाज सेवा को नमन और भावभीनी श्रद्धांजलि


भारत की हर बेटी के जीवन में शिक्षा का दीप जले-स्वामी चिदानन्द सरस्वती
3 जनवरी, ऋषिकेश। आज सावित्रीबाई फुले की 190 वीं जयंती के अवसर पर परमार्थ निकेतन के अध्यक्ष स्वामी चिदानन्द सरस्वती जी ने नारी अधिकारों, नारी शिक्षा और समाज सेवा के क्षेत्र में अविस्मर्णीय योगदान देने वाली प्रथम आधुनिक नारीवादी कार्यकर्ता सावित्रीबाई फुले जी की जयंती के अवसर पर श्रद्धासुमन अर्पित करते हुये कहा कि भारत की प्रथम महिला शिक्षक और बालिका विद्यालय की पहली प्राचार्या सावित्रीबाई फुले को नारी शिक्षा, साक्षरता और उस समय समाज में व्याप्त अस्पृश्यता  को समाप्त करने और पिछड़े वर्ग के उत्थान आदि अनेक उपलब्धियों के लिये उन्हंे हमेशा याद किया जायेगा।
स्वामी चिदानन्द सरस्वती जी ने कहा कि नारी शिक्षा, गरिमा, सम्मान और अधिकारों के लिये जीवन समर्पित करने वाली सावित्रीबाई ने वर्ष 1848 में पुणे में देश का पहला कन्या विद्यालय खोला था। वे एक एजुकेटर और एक्टिविस्ट के साथ सशक्त और सहृदय महिला थी, जो समाज के घोर विरोध के बावजूद स्वयं शिक्षित हुई और दूसरी नारियों को भी शिक्षित करने हेतु अपना सम्पूर्ण जीवन समर्पित कर दिया। 18 वीं व 19 वीं सदी में नारियों को शिक्षित करना और अस्पृश्यता आदि सामाजिक मुद्दों पर कार्य करना आसान नहीं था। कहा जाता है कि सावित्री बाई विद्यालय जाती थीं तो गांव के लोग उन पर गोबर और पत्थर फेंकते थे परन्तु उनके पति और सोशल एक्टिविस्ट श्री ज्योतिराव फुले जी ने उनका पूरा समर्थन किया। समाज के घोर विरोध के बावजूद भी दोनों अपने कर्तव्य पथ से विमुख नहीं हुये।
कवयित्री और मराठी काव्य की अग्रदूत सावित्रीबाई का मानना था कि शिक्षा के माध्यम से ही नारियाँ अपना सम्मान और गौरव वापस प्राप्त कर सकती हैं जिससे एक समृ़द्ध और सशक्त समाज का निर्माण किया जा सकता है। फुुले दम्पति ने मिलकर जेंडर इक्वलिटी और सोशल जस्टिस के लिये कई कार्य किये। साथ ही उन्होंने सत्यशोधक समाज नामक एक संस्था शुरू की जिसके माध्यम से वे दहेज प्रथा को समाप्त करना चाहते थे, वे चाहते थे कि समाज में बिना दहेज के विवाह प्रथा शुरू हो, विधवा विवाह, अस्पृश्यता का अंत, नारी मुक्ति और पिछड़े समुदायों के लोगों, विशेष कर महिलाओं को शिक्षित करना उनके जीवन का उद्देश्य था।
सावित्रीबाई फुले ने अपनी मराठी कविताओं के माध्यम से अस्पृश्यता का अंत, जेंडर इक्वलिटी, मानवता, समानता, एकता, बंधुत्व और शिक्षा के महत्त्व आदि विषयों को उजागर किया। उन्होंने नारी शिक्षा के लिये स्वयं अपनी आवाज को बुलंद किया और पूरा जीवन नारी अधिकारों के लिये संघर्ष किया।
स्वामी चिदानन्द सरस्वती जी ने कहा कि सावित्रीबाई फुले ने उस समय  कन्या भ्रूण हत्या को रोकने के लिये अद्भुत पहल की थी। कन्या भू्रण हत्या के लिये न केवल लोगों को जागरूक किया और अभियान चलाया बल्कि नवजात कन्याओं के लालन-पालन के लिये आश्रम भी खोले ताकि उन्हें सुरक्षित जीवन दिया जा सके। आधुनिक नारीवादी एक्टिविस्ट जो स्वंय शिक्षित हुई और दूसरों के जीवन में भी शिक्षा का दीप जलाया ऐसी महान विभूति की समाज सेवा को नमन और भावभीनी श्रद्धांजलि।

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