आज ही के दिन 3 दिसम्बर 1984 की वह रात जिनपे गुज़री है

आज ही के दिन 3 दिसम्बर 1984 की वह रात जिनपे गुज़री है ,, उनसे पूछिये कि रात क्या होती है
“पांच लाख अट्ठावन हज़ार एक सौ पच्चीस” लोग इंजर्ड , जिसमे तीन हज़ार लोग परमानेंटली डिसेबल हो गए
16 हज़ार मौतें हुईं
ज़हरीली गैस मिथाइल आइसो काइनेट नाम ज़हरीली गैस के रिसाव से लोग जो सो रहे थे वह फिर कभी नही जागे
यूनियन कार्बाइड इंडिया के अमेरिकन सीईओ यूसीसी ” वारेन एंडरसन ” को सरकारी सांठ गाँठ रसूख के चलते मात्र 2100 डॉलर के मामूली जुर्माने के बाद छोड़ दिया गया ,,
और देश से भगा दिया गया
उसके बाद भारत सरकार उसका कभी प्रत्यर्पण नही करा सकी , अगर सरकार की मंशा न्याय की होती तो उसे जाने ही क्यों देती,,
उसके प्रत्यर्पण से सरकारी भ्र्ष्टाचार खुलने का डर था
यह सरकारी भ्र्ष्टाचार ही था कि जो दुनिया की किसी आतंकवादी घटना से भी ज़्यादा भीषण और खूं रेज़ साबित हुआ था ,,,
1984 में केंद्र में इंदिरागांधी बिराजमान थीं और मध्यप्रदेश में अर्जुन सिंह बैठे थे
विडंवना यह है कि फशिष्ट प्रचार कर रहे हैं ” हिन्दू खतरे में है”
और जुम्मन बीजेपी के डर से थर थर कांप रहा है
… ऐसे में सरकारों को इन मसकेयर और भ्र्ष्टाचार से कोई फर्क नही पड़ता
डर…. पोलोराइजेशन के लिए एक दम सस्ता और सुलभ फैक्टर है
दुःखद यह है कि बड़े बड़े समझदार लोग इन कातिलों को सत्ता देने के लिए ज्ञान ध्यान लगाते नज़र आते हैं
भारतीय लोकतंत्र भगवा और सफेद ब्राह्मणवादी कातिलों की तानाशाही बन कर रह गया
1914 में अंततः एंडरसन बिस्तरे मर्ग पर चैन से अपनी मौत मरा ,, 5 लाख लोगों के जीवन को नेस्तोनाबूद करने वाला सरकारी अमेरिकन आतंकी अपनी पूरी जिंदगी आज़ाद और आराम से जिया
लेकिन इस से भी बदतरीन बात यह है कि इस सब से हम को कोई फर्क नही पड़ा
उस रात की सुबह नही थी ,, उस रात का अंधकार कभी नही छटा
वह आज भी यथावत है , ,, हमारे सियासी शऊर और इमानी तक़ाज़ों के जनाजे के रूप में
अभी तो 6 दिसम्बर बाकी है … लहू लुहान दिसम्बर

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निशाकांत शर्मा (सहसंपादक)

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