आंवला_में_ की टिकट की जंग : कुंवर सिद्धराज सिंह की दावेदारी क्यों ? सर्वराज सिंह  योगी से मुलाकात कर बड़ी सियासी हलचल

बरेली । आंवला की राजनीति में 2027 का चुनाव अभी दूर है, लेकिन टिकट की पटकथा लिखे जाने की चर्चाएं तेज हो चुकी हैं। सवाल सिर्फ यह नहीं है कि भाजपा किसे मैदान में उतारेगी, बल्कि सवाल यह भी है कि लगातार तीन चुनाव जीत चुकी सीट पर पार्टी निरंतरता चुनेगी या राजनीतिक पुनर्संयोजन का प्रयोग करेगी?

इसी सवाल के बीच सबसे ज्यादा चर्चा जिस नाम की हो रही है, वह है कुंवर सिद्धराज सिंह।

धर्मपाल सिंह वर्तमान में आंवला के भाजपा विधायक हैं और उत्तर प्रदेश सरकार में मंत्री रह चुके हैं। 2022 में उन्होंने 88,956 वोट लेकर 18,424 मतों से जीत दर्ज की थी। लेकिन 2017 का चुनाव आज भी आंवला की राजनीतिक कहानी का महत्वपूर्ण अध्याय है। उस चुनाव में भाजपा के धर्मपाल सिंह को 63,165 वोट मिले थे, जबकि सपा प्रत्याशी सिद्धराज सिंह को 59,619 वोट मिले। अंतर केवल 3,546 वोट था।

यानी सिद्धराज सिंह आंवला के लिए कोई अचानक उभरा हुआ नाम नहीं हैं। वह इस सीट पर प्रत्यक्ष विधानसभा चुनाव लड़ चुके हैं, बड़े मुकाबले में दूसरे स्थान पर रह चुके हैं और बाद में भाजपा में शामिल हो चुके हैं।

दिसंबर 2021 में सिद्धराज सिंह ने भाजपा की सदस्यता ग्रहण की थी। उस समय भी स्थानीय राजनीतिक रिपोर्टों में उन्हें आंवला की भाजपा राजनीति के प्रमुख संभावित चेहरों में गिना गया था।

लेकिन कहानी का सबसे महत्वपूर्ण अध्याय केवल सिद्धराज सिंह का भाजपा में आना नहीं है।

उनके पीछे जिस राजनीतिक परिवार की विरासत है, वह आंवला की राजनीति में लंबे समय से प्रभाव रखती रही है। सिद्धराज सिंह के पिता कुंवर सर्वराज सिंह आंवला लोकसभा क्षेत्र से सांसद रह चुके हैं और क्षेत्र की राजनीति में उनका नाम लंबे समय से स्थापित रहा है। 2017 के चुनावी हलफनामे में भी सिद्धराज सिंह के पिता के रूप में सर्वराज सिंह का नाम दर्ज है।

और अब अक्टूबर 2026 में सामने आया एक घटनाक्रम इस राजनीतिक चर्चा को और महत्वपूर्ण बना देता है।

कुंवर सर्वराज सिंह ने मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से मुलाकात की है। मुख्यमंत्री कार्यालय के आधिकारिक एक्स हैंडल से इस शिष्टाचार भेंट की तस्वीर साझा होने के बाद आंवला की राजनीति में इसके राजनीतिक अर्थ निकाले जाने लगे। स्थानीय रिपोर्ट के अनुसार योगी आदित्यनाथ और सर्वराज सिंह के पुराने राजनीतिक संबंध भी रहे हैं।

यह मुलाकात अपने-आप में टिकट का प्रमाण नहीं है। लेकिन राजनीति में कभी-कभी तस्वीर से ज्यादा महत्वपूर्ण वह समय होता है जब तस्वीर सामने आती है।

और समय बिल्कुल चुनावी है।

धर्मपाल सिंह के राज्यसभा पहुंचने के बाद आंवला विधानसभा में संभावित उत्तराधिकारी को लेकर चर्चा स्वाभाविक रूप से बढ़ी है। ऐसे समय में एक पूर्व सांसद का मुख्यमंत्री से मिलना और उसी राजनीतिक परिवार से आने वाले सिद्धराज सिंह का पहले से भाजपा में होना—इन दोनों घटनाओं को जोड़कर देखना स्थानीय राजनीति में स्वाभाविक चर्चा का विषय बन गया है।

सिद्धराज सिंह की दावेदारी का दूसरा महत्वपूर्ण पक्ष उनका चुनावी अनुभव है।

2017 में उन्होंने आंवला विधानसभा का चुनाव सीधे लड़ा और 59,619 वोट प्राप्त किए। वह जीत से केवल 3,546 वोट दूर रह गए थे।

इसके बाद उन्होंने राजनीतिक पाला बदला और भाजपा में शामिल हो गए। इसका अर्थ यह है कि यदि भाजपा उन्हें संभावित चेहरे के रूप में देखती है तो उसे किसी बिल्कुल नए व्यक्ति को मैदान में उतारने के बजाय ऐसे व्यक्ति के साथ काम करना होगा जो पहले ही इसी सीट पर विधानसभा चुनाव लड़ चुका है और क्षेत्र के चुनावी भूगोल से परिचित है।

यही वह बिंदु है जहां सिद्धराज सिंह की वर्तमान दावेदारी को केवल “पूर्व सपा प्रत्याशी” कहकर खारिज करना राजनीतिक रूप से अधूरा विश्लेषण होगा।

आज तस्वीर बदल चुकी है।

2017 का सपा प्रत्याशी अब भाजपा में है। पिता की राजनीतिक विरासत उसके साथ है। स्वयं विधानसभा चुनाव लड़ने का अनुभव उसके पास है। आंवला की स्थानीय राजनीति में उसका नाम पहले से जाना-पहचाना है और उसके पिता की मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से हालिया मुलाकात ने चर्चाओं को फिर हवा दे दी है।

बेशक, मैदान में दूसरे नाम भी हैं।

पूर्व विधायक आरके शर्मा का नाम चर्चा में है। समाजसेवी निहाल सिंह की सामाजिक सक्रियता और लोधी समाज में उनकी पहचान की चर्चा होती है। मझगवां के ब्लॉक प्रमुख यशवंत सिंह भी राजनीतिक परिवार और क्षेत्रीय संगठनात्मक आधार के कारण संभावित दावेदारों में गिने जा रहे हैं।

लेकिन सिद्धराज सिंह की स्थिति को अलग बनाता है उनका तीन स्तरों पर मौजूद आधार—राजनीतिक विरासत, प्रत्यक्ष चुनावी अनुभव और वर्तमान में भाजपा के भीतर मौजूदगी।

यही वह समीकरण है जिसे 2027 की भाजपा टिकट चर्चा में नजरअंदाज करना आसान नहीं होगा।

हालांकि यह भी उतना ही महत्वपूर्ण है कि भाजपा ने अभी तक आंवला से किसी उम्मीदवार की आधिकारिक घोषणा नहीं की है। इसलिए सिद्धराज सिंह को “फाइनल प्रत्याशी” कहना अभी राजनीतिक चर्चा को तथ्य के रूप में पेश करना होगा। लेकिन यह कहना भी कठिन होगा कि उनकी दावेदारी महज हवा में तैरता हुआ नाम है।

2017 का 3,546 वोट वाला मुकाबला आज भी उनके राजनीतिक रिकॉर्ड में दर्ज है। 2021 में भाजपा में प्रवेश दर्ज है। और अक्टूबर 2026 में उनके पिता सर्वराज सिंह की मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से मुलाकात भी सार्वजनिक रिकॉर्ड में आ चुकी है।

अब असली सवाल यही है कि भाजपा 2027 में आंवला के लिए क्या तलाश रही है—सिर्फ एक मौजूदा चुनावी चेहरे की निरंतरता या ऐसा चेहरा जो राजनीतिक विरासत, संगठन और पुराने चुनावी अनुभव को एक साथ जोड़ सके?

अगर दूसरा विकल्प पार्टी की रणनीति का हिस्सा बनता है, तो कुंवर सिद्धराज सिंह का नाम स्वाभाविक रूप से चर्चा के केंद्र में रहेगा।

आंवला की राजनीति में फिलहाल कोई आधिकारिक फैसला सामने नहीं आया है, लेकिन इतना जरूर है कि कुंवर सिद्धराज सिंह अब केवल 2017 के चुनाव के पूर्व प्रत्याशी नहीं हैं। वह भाजपा में शामिल हो चुके हैं, आंवला की चुनावी जमीन पर अपना मुकाबला देख चुके हैं और अब उनके राजनीतिक परिवार की सक्रियता ने 2027 की टिकट चर्चा को एक नया कोण दे दिया है।

टिकट किसे मिलेगा, यह भाजपा का केंद्रीय नेतृत्व तय करेगा।

लेकिन आंवला की सियासत में सवाल अब इतना भर नहीं रह गया है कि “सिद्धराज सिंह दावेदार हैं या नहीं?”

सवाल यह है कि अगर पार्टी पुराने समीकरणों को नए राजनीतिक समीकरणों से जोड़कर देखती है, तो सिद्धराज सिंह की दावेदारी को कितनी गंभीरता से तौला जाएगा?

और शायद यही सवाल आने वाले महीनों में आंवला की सबसे बड़ी राजनीतिक कहानी बनने वाला है।

About The Author

पं.सत्यम शर्मा

Learn More →

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

अपडेट खबर के लिए इनेबल करें OK No thanks