ब्रेस्ट कैंसर स्क्रीनिंग का सच : जानें – क्या मैमोग्राफी वाकई खतरनाक है या जीवनरक्षक ?

बरेली । ब्रेस्ट कैंसर की जांच कराने से बेवजह का डर और गलत इलाज का खतरा बढ़ जाता है? मैमोग्राफी को लेकर अक्सर यह बहस छिड़ती रही है कि इसमें उन ट्यूमर को भी बीमारी मान लिया जाता है जो जीवनभर नुकसान नहीं पहुंचाते—जिसे मेडिकल भाषा में ‘ओवरडायग्नोसिस’ कहते हैं।”
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पहले के अनुमानों में दावा किया जाता था कि ओवरडायग्नोसिस का खतरा 30% से 50% तक हो सकता है। लेकिन अब एक नई रिसर्च ने इस पूरी बहस का रुख ही मोड़ दिया है!
​यूनिवर्सिटी ऑफ सदर्न डेनमार्क की इस ताजा स्टडी में पाया गया है कि मैमोग्राफी से ओवरडायग्नोसिस का असल खतरा 50% नहीं, बल्कि घटकर सिर्फ 5% रह गया है।
​विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के मुताबिक, ब्रेस्ट कैंसर महिलाओं में सबसे आम कैंसर है, जिसके कारण हर साल 6 लाख 94 हजार से ज्यादा मौतें होती हैं और 24 लाख नए मामले सामने आते हैं।
​कई बार ब्रेस्ट में कोई गांठ महसूस नहीं होती, फिर भी कैंसर पनप रहा होता है। ऐसे में मैमोग्राफी ही वह तकनीक है जो शुरुआती स्तर पर बदलावों को पकड़ लेती है—और समय रहते पता चलने पर इलाज व पूरी तरह ठीक होने की संभावना कई गुना बढ़ जाती है।
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वैज्ञानिकों का साफ कहना है कि टेस्ट के बाद मामलों की संख्या बढ़ना हमेशा ओवरडायग्नोसिस नहीं होता। इसलिए अफवाहों और पुराने आंकड़ों के डर से स्क्रीनिंग टालना जानलेवा हो सकता है। मैमोग्राफी सुरक्षित है, भरोसेमंद है और सबसे बढ़कर—जिंदगी बचाने वाली है।

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पं.सत्यम शर्मा

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