
भारतीय राजनीति के दो ऐसे युगांतकारी चेहरों ने बीते दो दिनों में इस संसार से विदाई ली, जिनकी उपस्थिति भले ही सत्ता की गलियारों में अलग-अलग स्तर पर रही हो, लेकिन जिन्होंने ज़मीन से जुड़े आखिरी व्यक्ति को ही अपनी राजनीति का मूलमंत्र बनाया।
4 अगस्त को शिबू सोरेन और 5 अगस्त को सत्यपाल मलिक के निधन ने भारतीय लोकतंत्र की उस विचारधारा में एक सूनापन भर दिया है, जहाँ अक्खड़पन, सिद्धांतप्रियता और सत्ता-विरोध की निर्भीकता को अब तेजी से राजनीतिक अपराध समझा जाने लगा है।
झारखंड के दिशोम गुरु: शिबू सोरेन
शिबू सोरेन का जीवन आदिवासी चेतना, संघर्ष और सामाजिक पुनर्निर्माण की जीवित गाथा है। अविभाजित बिहार के हजारीबाग में जन्मे सोरेन की राजनीति महज सत्ता में भागीदारी का माध्यम नहीं, बल्कि आदिवासी अस्मिता की पुनर्रचना का उपक्रम था। महाजनी प्रथा के विरुद्ध शुरू हुआ उनका धान कटनी आंदोलन झारखंडी चेतना की नींव बन गया।
सोरेन ने केवल राजनीतिक रूप से आदिवासियों को संगठित नहीं किया, बल्कि सामाजिक-शैक्षणिक रूप से उन्हें स्वाभिमानी बनाया। रात्रि पाठशालाओं और नशा विरोधी अभियानों के माध्यम से उन्होंने जनजीवन को संवारने की कोशिश की।
उनका राजनीतिक जीवन तमाम उतार-चढ़ावों, मुकदमों, पदों और सत्ता-साझेदारी से भरा रहा, लेकिन हर पड़ाव पर वे अपने समुदाय और राज्य के हितों को सर्वोपरि रखते रहे। झारखंड मुक्ति मोर्चा की स्थापना से लेकर मुख्यमंत्री और केंद्रीय मंत्री के रूप में उनके योगदान को सत्ता की दृष्टि से नहीं, बल्कि जनसंघर्ष के दस्तावेज़ के रूप में देखा जाना चाहिए।
संविधान की आत्मा से संवाद: सत्यपाल मलिक
सत्यपाल मलिक का जीवन सत्ता के भीतर रहकर सत्ता से असहमति की कला का सबसे जीवंत उदाहरण है। वे भारतीय राजनीति के उस विरले व्यक्तित्व थे, जिन्होंने विचारधाराओं का बदलाव तो किया, लेकिन आत्मा की स्थिरता कभी नहीं खोई।
चौधरी चरण सिंह से लेकर नरेंद्र मोदी तक के राजनीतिक दौरों के साक्षी मलिक ने किसानों, युवाओं और वंचितों की आवाज़ बनने का जोखिम उठाया।
राज्यसभा सदस्य, लोकसभा सांसद, केंद्रीय मंत्री और फिर चार राज्यों के राज्यपाल बनने तक का सफर उन्होंने सत्ता से समीपता के बावजूद आलोचनात्मक विवेक के साथ तय किया।
चाहे पुलवामा हमला हो या किसान आंदोलन, अग्निवीर योजना हो या पहलवानों का संघर्ष, सत्यपाल मलिक ने सत्ता की चुप्पी के सामने खुलकर खड़े होने का साहस दिखाया।
उनकी आखिरी चिट्ठी, जो उन्होंने अस्पताल से सरकार और एजेंसियों को लिखी, एक मौन होते लोकतंत्र में प्रतिरोध की अंतिम आवाज जैसी है। उनका यह वाक्य — “मैं किसान कौम से हूं, ना डरूंगा, ना झुकूंगा” — आने वाली पीढ़ियों के लिए राजनीतिक नैतिकता की कसौटी बन सकता है।
राजनीति के सिकुड़ते प्रतिरोध और इनकी विरासत
आज जब राजनीति ‘सत्ता-सुख’ का पर्याय बनती जा रही है, तब शिबू सोरेन और सत्यपाल मलिक जैसे नेताओं की याद केवल श्रद्धांजलि नहीं, बल्कि आत्म-मंथन का अवसर है।
वे बताते हैं कि राजनीति केवल पद पाने और बचाने का खेल नहीं है, बल्कि यह एक सामाजिक जवाबदेही है, जो अंतिम व्यक्ति की पीड़ा को प्राथमिकता देती है।
इन दोनों नेताओं की विरासत हमें यह सिखाती है कि राजनीति का मूल्य न तो उसकी चमक में है और न ही उसकी चालाकियों में, बल्कि उस सच्चाई में है, जो जनता की आंखों से देखी जा सके और उनके हक में बोले जा सके।