
स्वामी अग्निवेश जी स्वभाव से विद्रोही थे। उनको किन्हीं निर्धारित मापदंडों के भीतर नियंत्रित करके रखना बहुत कठिन था। यही उनकी विशेषता थी तथा यही उनकी समस्या भी थी।स्वामी समर्पणानन्द जी जैसे सुधी संन्यासी से वैदिक सिद्धान्तों की शिक्षा पायी थी। प्रो.रमाकान्त उपाध्याय जैसे आर्य विद्वान् ने उन्हें आर्यसमाज में दीक्षित किया था।महर्षि दयानन्द और आर्य समाज का ऐसा रंग चढा कि भरी जवानी में प्रोफेसर की नौकरी को ठुकराकर आर्य राष्ट्र के निर्माण का संकल्प लेकर हरियाणा को कार्यक्षेत्र बनाकर आर्यसमाज की विचारधारा को जनजन तक पहूंचाने के कार्य में लग गये।त्याग का ऐसा जीवन्त उदाहरण विरले ही देखने को मिलता है। यह वह समय था जब स्वामी जी के भाषणों को सुनने के लिये नवयुवक दूर दूर से आते थेऔर आर्यसमाज से जुडने के लिये प्रेरणा प्राप्त करते थे। स्थिति ऐसी थी कि बडे बडे नेता उनके सामने बौने लगते थे।जब उनके प्रतिस्पर्धी उनका सामना करने में अपने आपको असहाय पा रहे थे तब उन्होंने उनके बारे में अफवाहें फैलाना शुरु कर दिया।वामपंथी और नक्सली कहना शुरु कर दिया।जातिवाद का भी खेल खेला गया।किसी ने उन्हें इस्लाम का एजेन्ट कहा।किसी ने उन्हें ईसाईयों का पिट्ठू बताया।जब कि वास्तविकता यह है वह केवल महर्षि दयानन्द के भक्त थे।वेदों के प्रति उनकी अनन्य निष्ठा थी। और अन्त समय तक बनी रही। वे बहुत प्रतिभाशाली थे। वे अकेले ऐसे संन्यासी थे जो कि अन्तर्राष्ट्रीय मंचों पर महर्षि के सिद्धान्तों की बहुत उपयुक्त व्याख्या करते थे। हिन्दी और अंग्रेजी में धाराप्रवाह लिख और बोल सकते थे।एक विशेषता यह भी थी कि वे सामने वाले व्यक्ति के पद और प्रतिष्ठा के कारण बिना प्रभावित हुये अपनी बात निर्भीकता से कहने की क्षमता थी। ऐसे विलक्षण संन्यासी के निधन से आर्यसमाज और पूरे मानवसमाज को अपूरणीय क्षति हुई है। मैं अपनी ओर से, अपने साथियों की ओर से एवं राष्ट्र निर्माण पार्टी की ओर से स्वामी अग्निवेश जी कोअश्रु पूरित भावभीनी श्र्द्धांजलि देता हूं।