सृष्टि की उत्पत्ति कैसे हुई?सृष्टि की उत्पत्ति कहाँ से हुई ?

सृष्टि की उत्पत्ति कैसे हुई यह सवाल कई दशकों से दुनिया भर के वैज्ञानिकों के लिए एक शोध का विषय रहा है। कई वैज्ञानिकों का मानना है कि किसी विस्फोट के कारण इस सृष्टि की उत्पत्ति हुई और फिर विकास के क्रम में धीरे-धीरे जीवो की उत्पत्ति आरंभ हुई।

परंतु हिंदू धर्म ग्रंथों की माने तो इस सृष्टि की रचना परमपिता ब्रह्मा जी ने अपने हाथों से की है। जिसका वर्णन विष्णु पुराण ,नारद पुराण सहित कई पुराणों और वेदों में किया गया है। और यही कारण है कि परमपिता ब्रह्मा को सृष्टि का रचयिता भी कहा जाता है।

परंतु इस पोस्ट में हम आपको बताने जा रहे हैं कि शिव पुराण सृष्टि की रचना के संबंध में क्या कहता है। तो चलिए बिना किसी देरी के आज की कथा शुरू करते हैं।

हर -हर महादेव ! प्रिय पाठकों

दोस्तों ! शिव पुराण के रूद्र संहिता में इस बात का वर्णन किया गया है कि जब नारदजी ने परमपिता ब्रह्मा जी से सृष्टि की उत्पत्ति के बारे में पूछा तो ब्रह्मा जी ने कहा कि —

देवर्षि !जैसा की आप जानते हैं कि मेरी उत्पत्ति श्री हरि के नाभि कमल से हुई है। जब मेरी उत्पत्ति हुई तो देवों के देव महादेव ने मुझे सृष्टि रचना का आदेश दिया और वे अंतर्धान हो गए गए। उसके बाद मैं उनकी आज्ञा का पालन करने के लिए ध्यान मग्न हो कर्तव्य का विचार करने लगा और फिर भगवान शंकर को नमस्कार करके श्रीहरि से ज्ञान पाकर परमानंद की प्राप्ति कर मैंने सृष्टि की रचना करने का निश्चय किया।

उसके पश्चात मैंने सृष्टि की रचना की इच्छा से भगवान शिव और उनका स्मरण कर सबसे पहले उनके द्वारा रचे हुए जल में अपनी अंजलि डाल कर जल को ऊपर की ओर उछाला। इससे वहां एक अंड प्रकट हुआ। जिसे 24 तत्वों का समूह कहा जाता है। हे मुनि श्रेष्ठ ! वह विराट आकार वाला अंड जड़रुप ही था। उसमें चेतनता ना देख कर मुझे बड़ा संशय हुआ।

और मैं अत्यंत कठोर तप करने लगा। इस तरह 12 वर्षों तक भगवान विष्णु के चिन्तन में लगा रहा। उसके बाद भगवान श्रीहरि स्वयं प्रकट हुए और बड़े प्रेम से मेरे अंगो का स्पष्ट करते हुए मुझसे प्रसन्नता पूर्वक बोले -की हे ब्रह्म तुम वर मांगो। मैं तुम्हारी तपस्या से अति प्रसन्न हूँ। मुझे तुम्हारे लिए कुछ भी अदेय नहीं है।

भगवान शिव की कृपा से मैं सब कुछ देने में समर्थ हूँ। यह सुन कर मैंने भगवान श्री हरि से कहा -हे प्रभु !आपने जो मुझ पर कृपा की है वह सर्वथा उचित ही है -क्योंकि भगवान शंकर ने मुझे आपके हाथों में सौंप दिया है, विष्णु आपको नमस्कार है।

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आज मैं आपसे जो कुछ मांगता हूं उसे दीजिए। प्रभु यह विराट 24 तत्वों से बने अंड में किसी तरह का चेतन नहीं हो रहा है। जड़ी भूत दिखाई देता है। हे नारायण !इस समय आप भगवान शिव की कृपा से यहां प्रकट हुए हैं। अतः शिव की सृष्टि शक्ति या विभूति से प्राप्त हुए इस अंड में चेतनता लाइए।

मेरे ऐसा कहने पर भगवान् शिव की आज्ञा में तत्पर रहने वाले महा विष्णु ने अनंत रूप का आश्रय ले कर उस अंड में प्रवेश किया। उस समय उन परम पुरुष के सहस्त्रो मस्तक ,सहस्त्रो नेत्र और सहस्त्रो पैर थे। उन्होंने भूमि को सब ओर से घेरकर उस अंड को व्याप्त कर लिया। मेरे द्वारा भली-भांति स्तुति की जाने पर जब श्री विष्णु ने उस अंड में प्रवेश किया था। तब वह 24 तत्वों का विकार रूप अंड सचेतन हो गया। पाताल से लेकर सत्यलोक तक की अवधि वाले उस अंड के रूप में वहां साक्षात श्री हरि ही विराजने लगे।

उस विराट अंड में व्यापक होने से प्रभु वैराज पुरुष कहलाए। प्रसन्न मुख महादेव ने ना केवल अपने रहने के लिए सुगम कैलाश नगर का निर्माण किया। जो सब लोको से ऊपर सुशोभित होता है। देवर्षि संपूर्ण ब्रह्मांड का नाश हो जाने पर भी बैकुंठ और कैलाश इन दोनों धामों का कभी नाश नहीं होता।

हे नारद !मैं सत्यलोक का आश्रय लेकर रहता हूँ। और महादेव जी की आज्ञा से ही मुझ में सृष्टि रचाने की इच्छा उत्पन्न हुई है। उसके बाद जब मैं सृष्टि की रचना की इच्छा से चिंतन करने लगा उस समय पहले मुझ में अंजान में ही पाप गुण ,तमों गुण सृष्टि का प्रादुरभाव हुआ। जिसे अविद्या पंचक कहते हैं।

तदनंतर प्रसन्न चित्त होकर शंभू की आज्ञा से मैं पुनः अनासक्त भाव से सृष्टि का चिंतन करने लगा। उस समय मेरे द्वारा स्थावर संज्ञक वृक्ष आदि की सृष्टि हुई। जिसे मुख्य सर्ग कहते हैं। यह पहला सर्ग है। वह भी अपने लिए पुरुषार्थ का साधक नहीं है ,यह जान कर सृष्टि की इच्छा रखने वाले मुझ ब्रह्मा से दूसरा सर्ग प्रकट हुआ।

जो दुख से भरा हुआ है। उसका नाम है तिर्यक स्रोता । वह सर्ग भी पुरुषार्थ साधक नहीं था। उसे भी पुरुषार्थ साधन की शक्ति से रहित जान जब मैं पुनः सृष्टि का चिंतन करने लगा। तब मुझ में शीघ्र ही तीसरे सात्विक सर्ग का प्रार्दुभाव हुआ। उसे उधर्व स्रोता कहते हैं।

यह देवसर्ग के नाम से भी विख्यात हुआ। देवसर्ग सत्यवादी तथा अत्यंत सुख दायक है। उसे भी पुरुषार्थ साधन की रूचि एवं अधिकार से रहित जानकर मैंने अन्य सर्ग के लिए अपने स्वामी श्री शिव का चिंतन आरंभ किया। तब जाकर भगवान शंकर की आज्ञा से एक रजोगुणी सृष्टि का प्रादुर्भाव हुआ। जिसे अवार्क श्रोता कहा गया है। इस सर्ग के प्राणी मनुष्य है। जो पुरुषार्थ साधन के उच्च अधिकारी है। तदनंतर महादेव जी की आज्ञा से भूत आदि की सृष्टि हुई। इस प्रकार मैंने 5 तरह की वैकृत सृष्टि का वर्णन किया है।

इनके सिवा 3 प्राकृत सर्ग भी कहे गए हैं। जो मुझ ब्रह्मा के सानिध्य से प्रकृति से ही प्रकट हुए हैं। इनमें पहला महत्त्व सर्ग है। दूसरा सुक्ष्म भूतों अर्थात तन्माताओ का सर्ग है और तीसरा वैकारिक सर्ग कहलाता है। इस तरह वे तीन प्राकृतिक सर्ग है। प्राकृत और वैकृत दोनों प्रकार के सर्ग को मिलाने से आठ सर्ग होते हैं।

इनके अलावा नवां कोमार्ग सर्ग है। जो प्राकृत और वैकृत भी है। इन सबके आयान्तर के भेद का मैं वर्णन नहीं कर सकता क्योंकि उसका उपयोग बहुत थोड़ा है। हे मुनि श्रेष्ठ !इन सबके बाद द्विचात्मक सर्ग का प्रतिपादन हुआ। इसी का दूसरा नाम कोमार्ग सर्ग है। जिसमें सन नंदन आदि कुमारों की महत्वपूर्ण सृष्टि हुई।

सनक आदि मेरे चार मानस पुत्र हैं। जो मुझ ब्रह्मा के ही समान है। वह महान बैरागी से संपन्न तथा उत्तम व्रत का पालन करने वाले हुए। उनका मन सदा भगवान शिव के चिंतन में ही लगा रहता है। वे संसार से विमुख एवं ज्ञानी है। परंतु उन्होंने मेरे आदेश देने पर भी सृष्टि का निर्माण करने से मना कर दिया।

यह सुनकर मुझे भयंकर क्रोध आ गया और उस समय मुझ पर मोहरूपी अंधकार छा गया। उस समय मैंने मन ही मन भगवान विष्णु का स्मरण किया और वे शीघ्र ही आ गए। उन्होंने मुझे समझाते हुए कहा की तुम भगवान शिव की प्रसन्नता के लिए तपस्या करो।

उसके बाद श्री हरि के आदेशानुसार मैं भगवान शिव के नाम से महाघोर एवं उत्कृष्ट तपस्या करने लगा। तपस्या करते हुए मेरी दोनों भौहें और नासिका के मध्य भाग से सर्वेश्वर एवं दयासागर भगवान शिव अर्धनारीश्वर रूप में प्रकट हुए। जो जन्म से रहित ,तेज़ की राशि एवं सर्वज्ञ एवं सर्वत्रिस्टा है।

उन नीललोहित नामधारी साक्षात उमावल्लभ शंकर को सामने खड़ा देख बड़ी भक्ति से मस्तक झुका उनकी स्तुति करके बड़ा प्रसन्न हुआ और ईश्वर से बोला प्रभु आप भांति भांति के जीवो की सृष्टि कीजिए। मेरी यह यह बात सुनकर देवाधिदेव महादेव ने अपने ही समान बहुत से रुद्र गुणों की सृष्टि की।

तब मैंने अपने स्वामी महेश्वर महारुद्र से फिर कहा -आप ऐसे जीवो की सृष्टि कीजिए जो जन्म और मृत्यु के भय से युक्त हो। मुनि श्रेष्ठ !मेरी ऐसी बात सुनकर करुणा सागर महादेव जी हंस पड़े और तत्काल मुझसे बोले जन्म और मृत्यु के भय से युक्त अशोभन जीवों की सृष्टि नहीं करूंगा। क्योंकि वो कर्मों के अधीन हो दुख के सागर में डुबे रहेंगे।

एक सामान्य मानव और भक्त में क्या अंतर् है।

मैं तो दुःख के सागर में डुबे हुए उन जीवों का उद्धार मात्र करूंगा। गुरु का स्वरूप धारण करके उत्तम ज्ञान प्रदान कर उन सबको संसार सागर से पार कर लूंगा। प्रजापति !दुख में डूबे हुए सारे जीव की तो तुम ही रक्षा करो। मेरी आज्ञा से इस कार्य में प्रवृत्त होने के कारण तुम्हें माया नहीं बाँध सकेगी।

मुझसे ऐसा कहकर श्रीमान भगवान नीललोहित महादेव देखते-देखते अपने पार्षदों के साथ वहां से तत्काल तिरोहित हो गए अथार्त चले गए। उसके बाद मैंने देवाधिदेव महादेव की आज्ञा के अनुसार अपने पूर्व मुख से ऋगवेद ,दक्षिण मुख से यजुर्वेद ,पश्चिम मुख से सामवेद और उत्तर मुख से अथर्ववेद की रचना की। तत्पश्चात मैंने —

आयुर्वेद ,धुनर्वेद ,गंधर्ववेद और स्थापत्य आदि उपवेदों की रचना की। फिर अपने मुख से इतिहास पुराण उत्पन्न किये और योगविद्या ,तप ,दान ,सत्य ,धर्म आदि की रचना की और अंत में मैंने अपने हृदय से औंकार (ॐ ) अन्य अंगो से वर्ण ,स्वर ,छंद आदि क्रीड़ा से सात सुर उत्पन्न किये।

परन्तु इन सबकी रचना करने के बाद जब मुझे लगा मेरी सृष्टि में वृद्धि नहीं हो रही। तो मैंने अपने शरीर को दो भागों में विभक्त कर दिया। जिनका नाम का और या यानी काया हुए। उन्हीं दो भागों में से एक से पुरुष तथा दूसरे से स्त्री की उत्पत्ति हुई। पुरुष का नाम मनु और स्त्री का नाम शतरूपा था। मनु और शतरूपा ने मानव संसार की शुरुआत की।

तो प्रिय पाठकों !अब तो आप जान ही गए होंगे कि सृष्टि की उत्पत्ति कैसे हुई।

इसी के साथ हम अपनी बात को यही समाप्त करते है और भोलेनाथ से प्रार्थना करते है की वो आपके जीवन को मंगलमय बनाये।

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निशाकांत शर्मा (सहसंपादक)

यह खबर /लेख मेरे ( निशाकांत शर्मा ) द्वारा प्रकाशित किया गया है इस खबर के सम्बंधित किसी भी वाद - विवाद के लिए में खुद जिम्मेदार होंगा

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