शिक्षा का सपना,आर्थिक बोझ में दबा

आज के दौर में शिक्षा को मौलिक अधिकार माना जाता है, लेकिन जब ज़मीनी हकीकत की बात आती है, तो गरीब परिवारों के लिए अपने बच्चों को पढ़ाना एक बहुत बड़ी चुनौती बन चुका है। महँगी फ़ीस, महँगी कापियाँ और किताबें जैसे खर्चे एक सामान्य मजदूर या किसान की कमाई के आगे बहुत भारी पड़ते हैं। ऐसे में सवाल उठता है कि गरीबों के बच्चे कैसे पढ़ें?
गरीब माता-पिता अपने बच्चों को पढ़ा-लिखा कर एक बेहतर भविष्य देना चाहते हैं, लेकिन निजी स्कूलों की ऊँची फीस, यूनिफॉर्म, कॉपी-किताबों और कोचिंग के खर्च उन्हें पीछे धकेलते हैं।

सरकार स्कूल चलाती है, पर वहाँ संसाधनों की कमी, शिक्षकों का मनमानी और शिक्षा की गुणवत्ता में गिरावट जैसी समस्याएँ हैं, और अगर अधिकारी और सरकार इन कमियों को नकार रहे हैं तो नेता और सरकारी अधिकारी अपने बच्चों को सरकारी स्कूलों में क्यों नहीं पढ़ाते ?

गरीब का बच्चा भी बड़े सपने देख सकता है, बशर्ते शिक्षा माफिया और सरकार उनकी राह से महंगाई के काँटे हटाएँ। शिक्षा को केवल अमीरों की सुविधा न बनाकर, हर बच्चे का अधिकार बनाया जाए — तभी असली विकास संभव होगा।

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निशाकांत शर्मा (सहसंपादक)

यह खबर /लेख मेरे ( निशाकांत शर्मा ) द्वारा प्रकाशित किया गया है इस खबर के सम्बंधित किसी भी वाद - विवाद के लिए में खुद जिम्मेदार होंगा

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