
भारतीय संविधान में वर्णित मीडिया कर्मियों के लिए दिए गए अधिकार वाले अधिनियम अनुच्छेद को लेकर पूरे देश में जनजागरण अभियान चलाएगी भारतीय मीडिया फाउंडेशन।
पत्रकार एवं सामाजिक कार्यकर्ताओं के अभिव्यक्ति की दूसरी आजादी की प्रथम महाक्रांति का होगा ऐलान।
नई दिल्ली।
भारतीय मीडिया फाउंडेशन के दिल्ली स्थित राष्ट्रीय कार्यालय से जारी बयान में भारतीय मीडिया फाउंडेशन के संस्थापक एके बिंदुसार ने संविधान में वर्णित मीडिया कर्मियों के अधिकारों को लेकर जंग का ऐलान किया है उन्होंने कहा कि जल्द ही आधिकारिक रूप से महा क्रांति की घोषणा की जाएगी जो निरंतर अपने लक्ष्य के प्रति तक यह अभियान जारी रहेगा।
उन्होंने बताया कि डॉ. भीमराव अंबेडकर, भारतीय संविधान के निर्माता, ने पत्रकारों और मीडिया कर्मियों के महत्व को गहराई से समझा था। लोकतंत्र के चौथे स्तंभ के रूप में मीडिया की भूमिका पर उनके विचार अत्यंत महत्वपूर्ण और दूरदर्शी थे। उन्होंने मीडिया की स्वतंत्रता और उसकी जिम्मेदारी दोनों पर जोर दिया था।
लोकतंत्र के चौथे स्तंभ के प्रति डॉ. अंबेडकर के विचार:
डॉ. अंबेडकर का मानना था कि एक स्वस्थ लोकतंत्र के लिए स्वतंत्र और निष्पक्ष मीडिया का होना अत्यंत आवश्यक है। उन्होंने मीडिया को जनता और सरकार के बीच एक महत्वपूर्ण कड़ी के रूप में देखा था। उनके अनुसार, मीडिया को निम्नलिखित भूमिकाएं निभानी चाहिए:
जनता की आवाज उठाना: मीडिया को उन लोगों की आवाज बननी चाहिए जिनके पास अपनी बात सरकार तक पहुंचाने का कोई और माध्यम नहीं है। उन्हें समाज के हाशिए पर रहने वाले वर्गों की समस्याओं और विचारों को प्रमुखता से उठाना चाहिए।
सरकार की निगरानी करना: मीडिया को सरकार के कार्यों पर कड़ी नजर रखनी चाहिए और किसी भी तरह की अनियमितता या भ्रष्टाचार को उजागर करना चाहिए। यह सुनिश्चित करता है कि सरकार जनता के प्रति जवाबदेह बनी रहे।
जनता को शिक्षित करना: मीडिया को महत्वपूर्ण सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक मुद्दों पर जनता को सही और निष्पक्ष जानकारी प्रदान करनी चाहिए। यह नागरिकों को जागरूक और सूचित निर्णय लेने में मदद करता है।
सार्वजनिक बहस को बढ़ावा देना: मीडिया को विभिन्न विचारों और दृष्टिकोणों को मंच प्रदान करना चाहिए ताकि स्वस्थ सार्वजनिक बहस को बढ़ावा मिल सके। यह लोकतंत्र को मजबूत करने के लिए आवश्यक है।
डॉ. अंबेडकर ने मीडिया की स्वतंत्रता को एक मौलिक अधिकार माना था, लेकिन इसके साथ ही उन्होंने यह भी कहा था कि इस स्वतंत्रता का उपयोग जिम्मेदारी और नैतिकता के साथ किया जाना चाहिए। उन्होंने झूठी या भ्रामक खबरें फैलाने और व्यक्तिगत या सांप्रदायिक विद्वेष पैदा करने वाली रिपोर्टिंग की कड़ी आलोचना की थी।
संविधान में मीडिया कर्मियों के लिए व्यवस्थाएं:
भारतीय संविधान में “मीडिया कर्मियों” के लिए संविधान के कई प्रावधान मीडिया की स्वतंत्रता और उनके अधिकारों की रक्षा करते हैं। डॉ. अंबेडकर ने इन प्रावधानों को बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी:
अनुच्छेद 19(1)(क): वाक् एवं अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता: यह अनुच्छेद प्रत्येक नागरिक को विचार और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अधिकार देता है। सर्वोच्च न्यायालय ने कई मामलों में यह स्पष्ट किया है कि प्रेस की स्वतंत्रता भी इसी अधिकार में निहित है। डॉ. अंबेडकर इस मौलिक अधिकार के प्रबल समर्थक थे और उन्होंने इसे लोकतंत्र की आधारशिला माना था।
कानून के समक्ष समानता (अनुच्छेद 14): यह अनुच्छेद कानून के समक्ष सभी नागरिकों को समान मानता है, जिसमें मीडिया कर्मी भी शामिल हैं।
भेदभाव का निषेध (अनुच्छेद 15): यह अनुच्छेद धर्म, जाति, लिंग या जन्मस्थान के आधार पर किसी भी नागरिक के साथ भेदभाव को रोकता है, जिसका लाभ मीडिया कर्मियों को भी मिलता है।
उपयुक्त कानूनी प्रक्रिया का अधिकार (अनुच्छेद 21): यह अनुच्छेद प्रत्येक व्यक्ति को जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार देता है, जिसमें मीडिया कर्मियों के अधिकार भी शामिल हैं।
इसके अतिरिक्त, डॉ. अंबेडकर ने एक ऐसे समाज की कल्पना की थी जहां सभी नागरिकों को अपने विचार व्यक्त करने और सूचना प्राप्त करने की स्वतंत्रता हो। उनका मानना था कि एक जागरूक और सूचित नागरिक ही एक मजबूत और सफल लोकतंत्र का निर्माण कर सकता है, और मीडिया इस प्रक्रिया में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
एके बिंदुसार ने कहा कि डॉ. भीमराव अंबेडकर मीडिया की स्वतंत्रता और उसकी महत्वपूर्ण भूमिका को लेकर स्पष्ट और दृढ़ विचार रखते थे। उन्होंने संविधान में ऐसे प्रावधानों को सुनिश्चित करने में महत्वपूर्ण योगदान दिया जो अप्रत्यक्ष रूप से मीडिया की स्वतंत्रता और अधिकारों की रक्षा करते हैं। उनका मानना था कि एक जिम्मेदार और स्वतंत्र मीडिया लोकतंत्र के लिए अपरिहार्य है।