
7 साल पहले किसी संस्थान के खिलाफ भ्रष्टाचार और धन शोधन के मामले में सी बी आई केस दर्ज करे और आज ये कह दे कि मेरे पास कोई सबूत नहीं है मुझे माफ कर दो।
ये किस्सा देश के अग्रणी मीडिया हाऊस एन डी टीवी से जुड़ा हुआ है। इसकी तबाही का स्क्रिप्ट 7 साल पहले उस समय शुरू हुआ जब देश के एक शीर्ष उद्योगपति ने अपने राजनीतिक आका के लिए कवच तैयार करने के लिए एक मीडिया हाऊस की आवश्यक्ता महसूस किया। उस समय निष्पक्ष पत्रकारिता के लिए विश्वसनीय समझे जा रहे एन डी टी वी को खत्म करने की भी जरूरत समझी गयी, क्योंकि वो सरकारी दबाव में नहीं आ रहा था। एक के बाद एक केस इसके खिलाफ दर्ज कर सी बी आई ने रेड करने की कार्यवाही शुरु की और संस्था के बैंक खातों को सीज कर उसके आर्थिक तार को तोड़ने का प्रयास किया गया।
सत्ता और संस्थान की इस लड़ाई में संस्थान को हारना था। प्रणव राय ने भी हार मान ली और एन डी टीवी अडानी के हाथों बेचने पर विवश होना पड़ा। ये कहानी आप सब जानते हैं। अब जबकि प्रणव राय ने भले ही हार मान ली किन्तु अपनी रीढ़ को झुकने नहीं दिया। सात साल बाद जब संस्थान सेठ की झोली में जा चुका है और एक निष्पक्ष संस्था से गोदी बन चुका है सी बी आई कह रही है कि उसके पास प्रणव राय और एन डी टी वी के खिलाफ कोई सबूत नहीं है। केस खत्म। मोदी सत्ता अपने उद्योगपति मित्रों के लिए कैसे बिसात बिछाती है ये इसका ताजा उदाहरण है। ये मामला चंदा और दूसरे तरीके से दबाव बनाने के तरीकों से अलग एक बहुत ही खतरनाक तरीका है, जिससे पता चलता है कि कैसे इस सरकार में सारे संस्थाओं को एक दो उद्योगपतियों के कदमों में डालने के लिए संवैधानिक संस्थानों का दुरूपयोग किया जा रहा है।