दारा सिंह अपने शारीरिक सौष्ठव की वजह से लोगों के आकर्षण का केन्द्र रहते थे

●दारा सिंह
जब दारा सिंह जी ने कुश्ती में हाथ आजमाने शुरू किये तब भारत अंग्रेजों को गुलाम था और स्थानीय मुकाबलों के अलावा आगे बढ़ने का कोई विशेष रास्ता नहीं था.

छोटे—मोटे मुकाबलों में पहलवानों को धूल चटाते हुये दारा सिंह आगे बढ़ने के लिये रास्ते की तलाश कर रहे थे. इसी बीच 1947 में भारत आजाद हो गया और दारा सिंह को भी सिंगापुर जाने का मौका मिला.

सिंगापुर में दारा सिंह को एक ड्रम बनाने वाली फैक्ट्री में नौकरी मिल गई. यहीं पर उन्होंने अपने गुरू हरनाम सिंह से अंतर्राष्ट्रीय स्तर की कुश्ती की ट्रेनिंग लेनी शुरू कर दी. हरनाम सिंह उन दिनों ग्रेट वर्ल्ड स्टेडियम से जुड़े हुये थे.

ग्रेट वर्ल्ड स्टेडियम सिंगापुर का एम्यूजमेंट पार्क था, जहां बहुत तरीको से लोगों का मनोरंजन किया जाता था और पूरी दुनिया से लोग इस पार्क में मनोरंजन के लिये आते थे.

दारा सिंह अपने शारीरिक सौष्ठव की वजह से लोगों के आकर्षण का केन्द्र रहते थे. दारा सिंह जी की height उनकी लंबाई 6 फुट 2 इंच थी. वजह 127 किलो और छाती की चौड़ाई 130 सेमी थी. इतना लंबा चौड़ा आदमी सहज ही सबको अपनी ओर आकर्षित कर लेता था.

यहीं पर उनको कुश्ती की अंतराष्ट्रीय दुनिया जिसे प्रोफेशनल रेसलिंग कहते हैं, उसकी जानकारी मिली. उनके गुरू ने उनकी शारीरिक मजबूती देखते हुये प्रोफेशनल रेसलिंग में हाथ आजमाने की सलाह दी और दारा सिंह ने उनकी इस सलाह को मान भी लिया.

दारा सिंह एक ऐसे पहलवान थे जिनके पास मजबूत शरीर के साथ ही एक सुंदर चेहरा भी था. यह वह दौर था जब उनके ही राज्य पंजाब से आने वाले धर्मेन्द्र बॉलीवुड पर छाये हुये थे. ऐसे में पंजाब से आने वाले एक और युवा दारा सिंह भी हिंदी फिल्म जगत में अपना भाग्य आजमाने आया.

1952 में उनकी पहली फिल्म आई संगदिल. फिल्म ने ठीक—ठाक काम किया लेकिन दारा ने सबका ध्यान अपनी ओर आकर्षित किया. इसके बाद उनकी फिल्में थोड़े—थोड़े अंतराल में आती रही लेकिन सफलता उन्हें 1962 में आई फिल्म किंगकांग से मिली.

इस फिल्म ने बॉक्स आफिस पर तहलका मचा दिया. इसके बाद तो उनके पास फिल्मों की झड़ी लग गई. उनको ज्यादातर ऐसी ही फिल्में मिली जिसमें या तो उनको पहलवान का रोल निभाना था या फिर किसी सूपर हीरो का.

500 दंगल में एक भी नहीं हारे थे महाबली दारा सिंह, उनकी डाइट जान रह जाएंगे हैरान.
6 फीट 2 इंच लंबे, 127 किलो वजनी और 53 इंच के सीने वाले दारा सिंह ने .500 से अधिक दंगल लड़े और उन्हें कभी भी हार नहीं मिली। दारा सिंह के दौर में कोई भी ऐसा पहलवान नहीं था, जिसे दारा सिंह ने हराया नहीं हो।
दारा सिंह रंधावा का जन्म 19 नवंबर 1928 को पंजाब में अमृतसर के धरमूचक गांव में बलवंत कौर और सूरत सिंह रंधावा के घर हुआ था। दारा सिंह ने 1950 और 1960 के दशक में तमाम राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय कुश्ती प्रतियोगिताओं में भाग लिया. 1947 में पहली बार मलेशियाई चैंपियन को मात दी. इसके बाद पीछे मुड़कर नहीं देखा. साल 1959 में कनाडा के मशहूर रेसलर किंग कॉन्ग को रिंग में पटखनी दी और फिर उन्हें उठाकर रिंग के बाहर ही फेंक दिया था। उनकी ये फाइट हमेशा याद रखी जाएगी। उस वक्त दारा सिंह का वजन 130 किलो था, जबकि किंग कांग 200 किलो के थे. दारा सिंह 1966 में रुस्तम-ए-पंजाब और 1978 में रुस्तम-ए-हिंद के खिताब से नवाजे गए.
दारा सिंह की डाइट भी कम नहीं थी. हर दिन एक पाव देसी घी, 4 लीटर तक दूध, 100 ग्राम बादाम, आधा किलो मीट, और 8 से 10 रोटियां खाया करते थे. अपनी आत्मकथा में लिखते हैं कि वह खाने के साथ हर दिन नियमित 100 ग्राम सेब और आंवले का मुरब्बा भी खाया करते थे.
दारा सिंह अपनी आत्मकथा में लिखते हैं कि वो ब्रेकफास्ट नहीं करते थे. दिन में सिर्फ दो बार खाना खाया करते थे. कसरत करने के बाद लस्सी (सीत) जरूर पिया करते थे. चिकन सूप भी पीते थे. सप्ताह में एक दिन व्रत रखते थे, ताकि उनका मेटाबॉलिज्म अच्छा रहे. दारा सिंह ने कभी आर्टिफिशियल डाइट- जैसे प्रोटीन पाउडर, कोई दवा जैसी चीज नहीं ली, बल्कि नेचुरल चीजों पर निर्भर रहे.
अपनी लंबी चौड़ी कद काठी और सुडौल शरीर की वजह से दारा सिंह को फिल्मों के ऑफर आने लगे, साल 1952 में आई ‘संगदिल’ फिल्म से इन्होंने अपने एक्टिंग करियर की शुरुआत की, अभिनेत्री मुमताज के साथ इनकी जोड़ी को दर्शकों ने खूब पसंद किया. दारा सिंह 60 के दशक में हर फिल्म के लिए 4 लाख रुपये लेते थे. रामानंद सागर की रामायण में हनुमान का किरदार निभा कर दारा सिंह घर-घर में मशहूर हो गए थे. रामायण सीरियल में हनुमान का किरदार निभाते वक्त दारा सिंह ने मांस खाना छोड़ दिया था और वो पूरी तरह से सात्विक हो गए थे
दारा सिंह, कुश्ती के अखाड़े और सिनेमा के बाद सियासत में भी उतरे. भारतीय जनता पार्टी में शामिल हुए और अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार ने उन्हें राज्यसभा भेजा. साल 2003 से 2009 तक राज्यसभा सदस्य रहे. उन्हें पद्मश्री से भी सम्मानित किया गया.

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निशाकांत शर्मा (सहसंपादक)

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