हमारी बेटी के बाद लता जी ने नूतन की फिल्म नगीना(1951) में एक गाना गाया था

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नूतन जी के बारे में एक बार महान लता मंगेशकर जी ने कहा था कि अगर एक्टिंग के हिसाब से टॉप एक्ट्रेसेज़ की बात हो तो नूतन नंबर वन पॉजिशन पर आएंगी। लता जी एक किस्सा साझा करते हुए कहा था,”1950 के दौरान नूतन की मां शोभना समर्थ अक्सर उनसे मिलने आती थी। वो एक फिल्म बना रही थी जिसका नाम था हमारी बेटी। वही फिल्म को डायेक्ट भी करने वाली थी। और म्यूज़िक दे रहे थे स्नेहल भटकर। जब गानों की रिकॉर्डिंग हो रही थी तब नूतन भी आई थी। वो बहुत खूबसूरत और लंबी कदकाठी की थी। उनकी आंखें बहुत प्यारी लग रही थी। उनकी उम्र उस वक्त 13-14 साल की रही होगी। लेकिन जिस गाने की रिकॉर्डिंग उस दिन हो रही थी उसमें वो कोई बच्ची नहीं बल्कि एक खूबसूरत लड़की लग रही थी।”

हमारी बेटी के बाद लता जी ने नूतन की फिल्म नगीना(1951) में एक गाना गाया था। बकौल स्वर्गीय लता मंगेशकर जी, बहुत ही थोड़े से समय में उन्होंने नूतन को फिल्म इंडस्ट्री की टॉप एक्ट्रेसेज़ की कतार में शुमार होते देखा था। नूतन जी को संगीत का भी बड़ा अच्छा सेंस था। और ऐसा इसलिए था क्योंकि उनकी मां शोभना समर्थ ने उन्हें एक्टिंग के साथ-साथ म्यूज़िक की ट्रेनिंग भी बहुत बढ़िया से दिलाई थी। शायद इसी कारण अपने गीतों में नूतन की स्क्रीन प्रजेंस इतनी बढ़िया रहती थी। सीमा फिल्म का गीत मनमोहन बड़े झूठे इसकी सबसे बेहतरीन मिसाल है। लता जी ने कहा था कि बंदिनी फिल्म में उन्हें नूतन जी का काम बहुत पसंद आया था। बाद में चरित्र किरदारों को भी नूतन जी ने बहुत अच्छी तरह से निभाया था।

बंदिनी फिल्म का एक किस्सा याद करते हुए एक दफा लता जी ने कहा था कि बंदिनी के आने से काफी पहले तक उनकी नूतन से बात नहीं हुई थी। एक दिन उनके पास एस.डी.बर्मन साहब का फोन आया। लता जी उन्हें दादा बर्मन कहती थी। और उन्हें पिता तुल्य मानती थी। बर्मन दा अपने टिपिकल स्टाइल में लता जी से बोले,”लोता, मेरे पास एक बहुत अच्छा गायक है। गीतकार भी नया है। उसका नाम गुलज़ार है। लेकिन गाना बहुत अच्छा है लोता। मोरा गोरा अंग लईले।” बर्मन दा ने लता से वो गाना रिकॉर्ड करने को कहा और लता जी ने भी हामी भर दी। उस गाने की रिकॉर्डिंग के दौरान उनकी नूतन से काफी वक्त बाद फिर से मुलाकात हुई थी। लता जी ने कहा था कि नूतन ने उस गाने में बहुत अच्छा काम किया है।

1990 में उन्हें स्तन कैंसर का पता चला। उन्होंने जिन फिल्मों के लिए साइन किया था, उनके लिए साइनिंग अमाउंट वापस कर दिया और निर्माताओं से जल्द ही औपचारिकताएं पूरी करने को कहा। 21 फरवरी, 1991 तक उनका कैंसर उनके फेफड़ों तक फैल गया था और उन्होंने ब्रीच कैंडी अस्पताल में अंतिम सांस ली। बाद में 2004 में एक आग दुर्घटना में उनके पति की मृत्यु हो गई।
(साभार व्हाट्सअप ग्रुप)

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निशाकांत शर्मा (सहसंपादक)

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