
आज गणेश महोत्सव का समापन दिवस है
इन्हें श्रध्दा पूर्वक भावों से पूज कर अगले वर्ष आने का निमंत्रण दे
ताकि यह हमारे बीच फिर अपनी गरिमामय उपस्थिति हमारे घरों और मंदिरों में आकर हमें आशीर्वाद दे सकें। अफसोस आज इनकी दुखद विदाई पर और हमारी भारतीय ढोंगी परम्पराओं की कि दस दिन सप्ताह भर पूजने के बाद इनका हम बड़े उत्साह से हम विसर्जन करने जाते है और किसी जल धारा में इन्हें फेंककर इन्हें अगली वर्ष का निमंत्रण भी दे आते हैं आने का पर हम अपनी इन परम्पराओं से आजतक यह नहीं समझ सके कि क्या इनका विसर्जन करना उचित है क्या इनकी जो दशा हम इंसान करते हैं इतनी सी पूजा के बाद बो उचित है इनके एक एक अंग के हजारों टुकड़े पड़े होते हैं विसर्जन के बाद और हम फिर अगली वर्ष का निमंत्रण देते हैं हमारे ना समझी का कारण यही है कि जब हम इनको जल परवाह करके इनके मूर्ति रूप शरीर को एक मुर्दा कृत्य में कार्य करके इन्हें जिंदा कैसे कह सकते हैं और जब यह मार ही दिये गये है तो अगली वर्ष कैसे आएंगे मुर्दे क्या खाक जिया करते है तब हम अपने सार्थक विचारों से अनुरोध करते हैं कि इस सर्मनाक श्रध्दा को रोकने का अभी तक सरकार और कानून ने कोई प्रयास क्यों नहीं किया क्या इंसान देवों से बड़ा हो गया जो हर साल उन्हें मारकर जिंदा भी कर लेता है।अब आप सभी की सोच उन मूर्तियों पर जा रही होगी जो आपने इन्हें लाने में खर्च किया और अब हर बार कहां रखी जाएं तो हम इस परम्परा को क्यों नहीं शुरू करते हैं हम इन मूर्तियों को उसी मूर्ति कार को वापस करके उससे अगले वर्ष नये रंगों में सजाकर हमें दे इस तरह से उस मूर्ति कार का भी फायदा और हमारे देवों का जो इंसान के द्वारा अपमान होता है बंद हो सके पूर्व की कुछ परम्पराओं में बहुत कुछ ग़लत हुआ है उसे रोकना शिक्षित समाज का दायित्व बनता है जब परिवर्तन प्रकृति और इंसान में हो सकता है तो बुरी रीति रिवाजों को हमारे समाज से खत्म भी करना जरूरी है।
लेखिका, दीप्ति चौहान।