
नीरज चोपड़ा की स्वर्णिम जीत को न केवल याद किया जाएगा, बल्कि इससे दूसरे भारतीय खिलाड़ी भी हमेशा प्रेरणा लेंगे
ओलंपिक में भारत को स्वर्ण दिलाने वाले नीरज चोपड़ा ने विश्व एथलेटिक्स चैंपियनशिप में भी अपने नाम का डंका बजाकर यह साबित कर दिया है कि जैवलिन थ्रो या भाला फेंक प्रतिस्पर्द्धा में उनकी सफलता कोई तुक्का नहीं है। ऐसा अक्सर देखा गया है कि भारतीय खिलाड़ी एकाध अच्छे प्रदर्शन के बाद धीरे-धीरे नेपथ्य में चले जाते हैं, पर नीरज की खासियत है कि ओलंपिक स्वर्ण के बावजूद उनकी भूख शांत नहीं हुई है। वह अपना ओलंपिक स्वर्ण लेकर हवा में नहीं उड़ रहे हैं। उनके पांव आज भी जमीन पर हैं और तभी जब वह भाला फेंकते हैं, तो वह दूर तक जाता है। ध्यान रहे, क्षमता और तैयारी की वजह से नीरज में बेहतर से बेहतर प्रदर्शन की असीम गुंजाइश है। बुडापेस्ट में स्वर्ण के लिए उन्होंने अपना सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन नहीं किया है। वह कम से कम तीन बार 89 मीटर से ज्यादा दूर भाला फेंक चुके हैं। मतलब, अगर मौका मुफीद रहा, तो वह 90 मीटर की दूरी भी पार कर सकते हैं।
नीरज सफलता की एक बेहतरीन मिसाल बन गए हैं। उन्होंने किसी समय अपने मोटापे को दूर करने के लिए भाला फेंकना शुरू किया था और आज उनकी छोटी सी कोशिश बड़ी सफलताओं का रूप ले चुकी है। एक-दो बातें गौर करने की हैं। अव्वल तो इस समय दुनिया में ऐसे खिलाड़ी भी हैं, जो नीरज से भी ज्यादा दूर तक भाला फेंक चुके हैं। मिसाल के लिए, विश्व चैंपियनशिप में रजत पदक जीतने वाले पाकिस्तान के अरशद नदीम और कांस्य पदक जीतने वाले चेक गणराज्य के जाकूब वाल्देच तो 90 मीटर तक भाला फेंक चुके हैं, लेकिन बुडापेस्ट में दोनों खिलाड़ी 88 मीटर की सीमा भी पार नहीं कर सके। अगर नीरज यह मानकर चलते कि उनका मुकाबला ऐसे खिलाड़ियों से है, जो उनसे भी ज्यादा दूर तक भाला फेंक चुके हैं, तो वह हतोत्साहित हो जाते। अपनी क्षमता या तुलनात्मक रूप से कुछ कमतर रिकॉर्ड के बावजूद नीरज में मुकाबले के लिए जो जज्बा है, वह लाजवाब है। उनमें किसी भी प्रतिद्वंद्वी के प्रति भय का भाव नहीं है। वह निरंतर अभ्यास में जुटे रहते हैं, दुनिया में जहां भी पहुंचकर वह अपने प्रदर्शन को सुधार सकते हैं, पूरे मनोयोग से वैसा करते रहे हैं।
इसमें कोई दोराय नहीं है कि भारतीय खिलाड़ियों ने विश्व स्तर पर कई बार आखिरी मौके पर दबाव में आकर पदक गंवाया है। अगर हमारे खिलाड़ी दबाव में आने के बजाय अपना ध्यान केवल अपने प्रदर्शन के सुधार पर लगाएं, तो भारत खेलों की दुनिया में वह चमक हासिल कर सकता है, जिसका वह वाकई हकदार है। बेशक, भारत में खेल सुविधाओं और प्रशिक्षण का विस्तार हुआ है, पर वास्तव में नीरज चोपड़ा का स्वर्ण हो या अभिनव बिंद्रा का स्वर्ण, दोनों के पीछे व्यक्तिगत मेहनत, लगन और जुनून का योगदान सर्वाधिक है। खैर, भारतीय खिलाड़ियों को विश्व स्तर पर वाजिब मुकाम पाने के लिए अभी लंबा सफर तय करना है। विश्व एथलेटिक्स चैंपियनशिप में भारत एकमात्र नीरज चोपड़ा के स्वर्ण पदक के साथ 18वें स्थान पर रहा है। मतलब, खेलों की दुनिया में हमें नीरज जैसे अनेक मैदान-वीरों के साथ झंडे गाड़ने का जतन करना चाहिए।