मोटे अनाज फिर चलन में लौट आए, रिपोर्ट योगेश मुदगल

मोटे अनाज फिर चलन में लौट आए, रिपोर्ट योगेश मुदगल

मोटे अनाज भविष्य के भोजन हैं। राष्ट्रीय स्तर पर अब किसी को संदेह नहीं रह गया है कि मोटे अनाज का उत्पादन, खपत, प्रसंस्करण, निर्यात और इसमें प्रौद्योगिकी का इस्तेमाल बढ़ना तय है। मोटे अनाज केवल भविष्य ही नहीं हैं, मोटे अनाज का समृद्ध इतिहास रहा है। मोटे अनाज में मुख्य तौर पर ज्वार, बाजरा, महुआ, जौ, कोदो, सांवा, बाजरा, कुटकी, कांगनी जैसे अन्न शामिल हैं। इन्हें श्री अन्न या कदन्न भी कहते हैं। श्री अन्न भारत और दुनिया के लोगों द्वारा खेती और उपभोग किए जाने वाले सबसे शुरुआती अनाजों में से एक है। साल 2023 को अंतराष्ट्रीय मोटे अनाज (मिलेट्स) वर्ष के रूप में मनाया जा रहा है, इसका असर भी जगह-जगह दिखने लगा है।

एफएओ (फूड ऐंड एग्रीकल्चर ऑर्गेनाइजेशन) के अनुसार, कदन्न फसलों को विश्व में 75.70 मिलियन हेक्टेयर क्षेत्र में उगाया जाता है, जिसका उत्पादन 90.35 मिलियन मीट्रिक टन है। भारत कदन्न फसलों का पांचवां सबसे बड़ा निर्यातक है, लेकिन यहां उत्पादन ज्यादा है। वर्ष 2020 में भारत ने वैश्विक कदन्न उत्पादन में 41 प्रतिशत का योगदान दिया था। यह सच है कि भारत में मोटे अनाज की खेती पिछले पचास-साठ वर्षों में उत्तरोतर कम होती गई है। 1950 से 2018 तक मोटे अनाज का क्षेत्र 9.02 मिलियन हेक्टेयर से घटकर 7.38 मिलियन हेक्टेयर हो गया था। राजस्थान बाजरा के क्षेत्र और उत्पादन, दोनों में अग्रणी राज्य है, जबकि महाराष्ट्र ज्वार के लिए क्षेत्र और उत्पादन में उच्चतम है।

गौरतलब है कि वैश्विक स्तर पर जलवायु परिवर्तन से अनाजों के उत्पादन पर असर दिखने लगा है। भविष्य में अति-विषम जलवायु का अनुमान लगाया जा रहा है, तो कदन्न फसलें जलवायु-स्मार्ट साबित हो सकती हैं। कृषि वैज्ञानिकों ने भी मोटे अनाजों के महत्व को समझ लिया है। अनेक मोटे अनाज की खेती कम पानी व विषम जलवायु में भी संभव है। इनका प्रचार बुनियादी रूप से भारतीय कृषि को मजबूत करेगा। हैदराबाद स्थित इंडियन इंस्टीटॺूट ऑफ मिलेट रिसर्च निरंतर अनुसंधान में जुटा है और मोटे अनाज की दो हजार से अधिक किस्मों के विकास पर काम कर रहा है। अकेले ज्वार, बाजरा की ही सैकड़ों किस्में भारत में मौजूद हैं। जलवायु और जमीन के हिसाब से मोटे या पोषक अनाजों की खेती को बढ़ावा देने का कार्य युद्ध स्तर पर जारी है।

उत्तर प्रदेश और बिहार में मोटे अनाज के उत्पादन की असीम संभावनाएं हैं। बिहार को 2015-16 में मोटे अनाज के वर्ग में पूरे देश में सर्वोच्च उत्पादन के लिए कृषि कर्मण पुरस्कार मिल चुका है। बिहार में मोटे अनाज को लोग कतई भूले नहीं हैं। अगर हम भारत में कदन्न के उपयोग या खपत को देखें, तो असम (18.82 किग्रा/ व्यक्ति प्रतिवर्ष) और बिहार (18.65 किग्रा/व्यक्ति प्रति वर्ष) में मोटे अनाज की खपत सबसे अधिक है। बिहार जहां सब्जी उत्पादन में तीसरे और फल उत्पादन में चौथे स्थान पर है, वहीं मोटे अनाज के उत्पादन में यहां बहुत कुछ करने की जरूरत है। ये अनाज गरीब राज्यों व किसानों के लिए ज्यादा कारगर हो सकते हैं, क्योंकि मोटे अनाज के उत्पादन में लागत कम आती है। ये फसलें मिट्टी की कमियों के प्रति भी कम संवेदनशील होती हैं तथा इन्हें कम जलोढ़ या लोमी मिट्टी में भी उगाया जा सकता है। इन्हें जल, उर्वरक और कीटनाशकों की भी न्यूनतम जरूरत पड़ती है। मोटे अनाज की खेती कार्बन फुटप्रिंट को भी कम करने में मदद करती है। मोटे अनाज से किसानों का स्वयं का स्वास्थ्य भी सुदृढ़ हो सकता है।

किसानों को इस बात से भी प्रेरित होना चाहिए कि मोटे अनाज की मांग दुनिया भर में बढ़ रही है। मोटे अनाज का वैश्विक निर्यात 2019 में 38 करोड़ डॉलर से बढ़कर 2020 में 40 करोड़ 27 लाख डॉलर हो गया है। निर्यात बढ़ने के साथ घरेलू खपत में भी तेजी से वृद्धि हो रही है। तमाम कृषि संस्थान किसानों को मोटे अनाज उत्पादन के लिए प्रेरित कर रहे हैं। मोटे अनाज का उत्पादन और निर्यात आने वाले वर्षों में तेजी से बढ़ना तय है।

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निशाकांत शर्मा (सहसंपादक)

यह खबर /लेख मेरे ( निशाकांत शर्मा ) द्वारा प्रकाशित किया गया है इस खबर के सम्बंधित किसी भी वाद - विवाद के लिए में खुद जिम्मेदार होंगा

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