केवल दर्जा ही नहीं अपितु सोच भी राष्ट्रीय होना चाहिए

केवल दर्जा ही नहीं अपितु सोच भी राष्ट्रीय होना चाहिए

गत दिवस चुनाव आयोग द्वारा आम आदमी पार्टी को राष्ट्रीय पार्टी का दर्जा देने के साथ ही राकांपा और तृणमूल सहित कुछ दलों को राष्ट्रीय दलों की सूची से बाहर कर दिया गया | इस हेतु जो मानक तय किये गए हैं उन पर आम आदमी पार्टी ने अपने को साबित कर दिया | मसलन दिल्ली और पंजाब में सरकार बनाने के साथ ही गोवा और गुजरात विधानसभा चुनाव में मिले मतों के आधार पर उसे राष्ट्रीय पार्टी की हैसियत दे दी गयी |

पार्टी के संयोजक अरविन्द केजरीवाल सहित अन्य नेताओं ने इस पर खुशी जाहिर करने के साथ ही कहा कि इतनी कम अवधि में यह दर्जा हासिल करना किसी उपलब्धि से कम नहीं है | श्री केजरीवाल ने यह विश्वास भी जताया कि अब आम आदमी पार्टी स्वयं को राष्ट्रीय विकल्प के तौर पर बेहतर तरीके से पेश कर सकेगी | उसका आशावाद गलत भी नहीं है क्योंकि 2014 में महानगर पालिका जैसी दिल्ली विधानसभा पर काबिज होने के बाद उस करिश्मे को दोबारा दोहराना और फिर पंजाब जैसे राज्य में भारी बहुमत के साथ सत्ता में आना निश्चित तौर पर किसी भी ऐसे राजनीतिक दल के लिए गर्व करने लायक है

जिसका भारत में स्थापित राजनीतिक विचारधाराओं से कोई वास्ता नहीं है | यह पार्टी न तो जाति की बात करती है और न ही धर्म की | भाषा , क्षेत्र या ऐसे ही किसी और सम्वेदनशील मुद्दे से भी वह दूर है | उसका उदय अन्ना हजारे के लोकपाल आन्दोलन की कोख से हुआ था | और तब भ्रष्टाचार के विरुद्ध निर्णायक लड़ाई उसका घोषणापत्र था |

लेकिन उसे सत्ता मिली उन वायदों से जो पूरी तरह स्थानीय और आम आदमी की दैनिक ज़िन्दगी से जुड़े थे | मुफ्त बिजली , पानी , सरकारी विद्यालयों में गुणवत्ता युक्त शिक्षा और मुहल्ला क्लीनिक जैसी बातें दिल्ली के लोगों के मन में बैठ गईं और उन्होंने इस पार्टी को आजमाने का फैसला किया | 2014 के लोकसभा चुनाव में प्रचंड मोदी लहर में आम आदमी पार्टी ने जमानत जप्ती का रिकॉर्ड तो बनाया परन्तु श्री केजरीवाल ने वाराणसी में नरेंद्र मोदी के मुकाबले उतरकर भविष्य का संकेत दे दिया |

कुछ महीनों बाद ही वे दिल्ली के मुख्यमंत्री बन गए | सातों लोकसभा सीटें जीतने वाली भाजपा तीन विधायकों तक सिमट गयी वहीं कांग्रेस का तो सूपड़ा ही साफ हो गया | इसी के साथ श्री केजरीवाल की महत्वाकांक्षाएं भी परवान चढ़ने लगीं और बजाय दिल्ली की राजनीति में सीमित रहने के वे सीधे प्रधानमंत्री से टकराने की नीति पर चलने लगे | देश के भ्रष्ट नेताओं की सूची जारी करते हुए पार्टी ने अपने आपको दूध का धुला और श्री केजरीवाल को राजा हरिश्चन्द्र का अवतार साबित करने का दांव भी चला |

चूँकि दिल्ली की जनता से किये वायदे पूरे किये गए इसलिए देश भर में इस पार्टी को लेकर उत्सुकता पैदा हुई | हालांकि अभी तक दो राज्य ही उसके कब्जे में आये हैं | गोवा और गुजरात में वह इस अंदाज में लड़ी जैसे वहां भी दिल्ली और पंजाब की कहानी दोहराई जायेगी किन्तु उसकी उम्मीदें पूरी नहीं हो सकीं | हालाँकि वायदे तो उसने दिल्ली वाले ही किये किन्तु मतदाताओं पर उसका असर बहुत सीमित रहा | लेकिन उस कारण वह राष्ट्रीय पार्टी का दर्जा हासिल करने में जरूर सफल हो गई जिसके अपने फायदे हैं, विशेष रूप से लोकसभा चुनाव में | सही बात तो ये है कि ये पार्टी उन राज्यों में ही पैर जमा पा रही है जहां कांग्रेस और भाजपा में सीधा मुकाबला है |

लेकिन जहां भी अन्य क्षेत्रीय दल मजबूत हैं वहां आम आदमी पार्टी का प्रभाव अपेक्षानुसार नहीं बढ़ रहा | दरअसल श्री केजरीवाल की समस्या ये है कि वे सभी नेताओं और पार्टियों को भ्रष्ट मानते रहे हैं | ऐसे में किसी के साथ गठबंधन में उनको हेटी लगती है | यद्यपि भाजपा के विरोध में वे अन्य विपक्षी दलों के साथ उठते – बैठते तो रहे लेकिन जब भी गठबंधन की बात होती है तो वे मेरी मुर्गी की डेढ़ टांग साबित करते हुए अलग हो जाते हैं |

हाल ही में अपने दाहिने हाथ कहे जाने जाने वाले मनीष सिसौदिया की गिरफ्तारी के बाद मजबूरन वे कांग्रेस के साथ मिलकर ईडी और सीबीआई के विरुद्ध आवाज उठाने लगे | और राहुल गांधी की सदस्यता समाप्त किये जाने का विरोध भी उन्होंने किया क्योंकि अपने दो पूर्व मंत्रियों के जेल जाने के बाद उनकी ईमानदारी का दावा कमजोर पड़ने लगा | यहाँ तक कि लालू प्रसाद यादव के परिजनों पर पड़े छापे का भी आम आदमी पार्टी ने विरोध किया | ऐसे में राष्ट्रीय पार्टी बन जाने के बाद वह अपने को भाजपा और कांग्रेस के विकल्प के तौर पर किस आधार पर पेश करेगी ये बड़ा सवाल है |

एक बात और भी है कि मुफ्त उपहार की जो राजनीति इस पार्टी की पहिचान बनी उसे तो अन्य दलों ने भी अपना लिया | कुछ तो उससे भी आगे निकल चुके हैं | भाजपा और काग्रेस भी चुनावों में खैरात बाँटने में किसी से पीछे नहीं हैं | और फिर श्री केजरीवाल तथा आम आदमी पार्टी के अन्य नेता देश के सामने कोई विचारधारा पेश करने में विफल हैं | देश की सुरक्षा और विदेश नीति के साथ ही अर्थव्यवस्था जैसे गंभीर मुद्दों पर इस पार्टी का दृष्टिकोण एक तो अस्पष्ट है और जो है भी वह भी मुख्यधारा से मेल नहीं खाता |

अरविन्द केजरीवाल न तो अब पहले जैसे ईमानदार माने जा रहे हैं और न ही उनकी पार्टी की छवि भी वैसी रही | यही वजह है कि आम आदमी पार्टी के अधिकांश संस्थापक सदस्यों को तो या तो बाहर निकाल दिया गया या फिर वे खुद छोड़कर चलते बने | अब जबकि वह राष्ट्रीय पार्टी बन चुकी है तब उसे अपनी सोच को भी राष्ट्रीय बनाना होगा | मुफ्त बिजली – पानी जैसे मुद्दे तो अपनी जगह हैं लेकिन जब तक पार्टी राष्ट्रीय के साथ ही अंतर्राष्ट्रीय मुद्दों पर अपना दृष्टिकोण सामने नहीं रखती तब तक उसे व्यापक स्तर पर सफलता की उम्मीद नहीं करनी चाहिए | और ये भी कि व्यर्थ की बातों में उलझने की वजह से दिल्ली और पंजाब की सरकार के विरुद्ध असंतोष के स्वर सुनाई देने लगे हैं |

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निशाकांत शर्मा (सहसंपादक)

यह खबर /लेख मेरे ( निशाकांत शर्मा ) द्वारा प्रकाशित किया गया है इस खबर के सम्बंधित किसी भी वाद - विवाद के लिए में खुद जिम्मेदार होंगा

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