*दिल्ली में आम आदमी पार्टी द्वारा बालकों का शोषण।
*दिल्ली के पूर्व डिप्टी सीएम मनीष सिसोदिया एवं उनके समर्थकों द्वारा किशोर न्याय (बालकों की देखरेख एवं संरक्षण) अधिनियम 2000 की धारा 23 एवं 26 का घोर उल्लंघन।*
*भारतीय मीडिया फाउंडेशन ने की कानूनी कार्रवाई की मांग बीएमएफ संस्थापक एके बिंदुसार ने कहा कि बच्चों से श्रम कार्य करवाने को संज्ञेय श्रेणी का अपराध माना गया है । बाल श्रम ( रोकथाम एवं नियंत्रण) अधिनियम, 1986 के अनुसार बच्चों से घर, दफ्तर, कारखानों अथवा कहीं भी श्रम पर लगाना कानूनन अपराध है।*

वाराणसी–
दिल्ली में आम आदमी पार्टी के द्वारा नाबालिक बच्चों के माध्यम से जगह-जगह पूर्व डिप्टी सीएम मनीष सिसोदिया के समर्थन में पत्र लिखवाना नाबालिक बच्चों का राजनीतिकरण करना यह बाल अधिकार अधिनियम का घोर उल्लंघन है।
भारतीय मीडिया फाउंडेशन के संस्थापक एके बिंदुसार ने आम आदमी पार्टी एवं मनीष सिसोदिया के समर्थकों के द्वारा दिल्ली के विभिन्न जगहों पर स्टाल लगा कर के नाबालिक बच्चों का राजनीतिकरण और उनसे श्रम कराकर लेटर लिखवाना बाल अपराध करने का आरोप लगाया है।
उन्होंने कहा कि आम आदमी पार्टी का यह लेटर बम कानून का घोर उल्लंघन करते हुए बालकों के भविष्य से खिलवाड़ कर रही है उन्होंने कहा कि संविधान बाल शोषण का अधिकार नहीं देती।
उन्होंने इस कार्य में लिप्त आम आदमी पार्टी के नेताओं कार्यकर्ताओं एवं दिल्ली के पूर्व डिप्टी सीएम मनीष सिसोदिया के समर्थकों एवं मनीष सिसोदिया पर बाल शोषण अधिनियम के तहत मुकदमा दर्ज करने की मांग की हैं।
उन्होंने बताया कि भारत का संविधान छह से चौदह वर्ष की आयु के सभी बच्चों के लिए कानून, मुफ्त और अनिवार्य प्राथमिक शिक्षा के साथ समानता सहित कई अधिकारों की गारंटी देता है, बच्चों की तस्करी और जबरन श्रम पर प्रतिबंध और कम उम्र के बच्चों के रोजगार पर प्रतिबंध। चौदह वर्षों में कारखानों, या खतरनाक व्यवसायों में
किशोर न्याय (बालकों की देखरेख एवं संरक्षण) अधिनियम 2000 की धारा 23 एवं 26 में बच्चों से श्रम कार्य करवाने को संज्ञेय श्रेणी का अपराध माना गया है । बाल श्रम ( रोकथाम एवं नियंत्रण) अधिनियम, 1986 के अनुसार बच्चों से घर, दफ्तर, कारखानों अथवा कहीं भी श्रम पर लगाना कानूनन अपराध है। जिसका घोर उल्लंघन दिल्ली में आम आदमी पार्टी एवं पूर्व डिप्टी सीएम मनीष सिसोदिया के समर्थकों द्वारा किया जा रहा है।
जिस पर केंद्र सरकार को एवं मानवाधिकार को संज्ञान में लेकर कड़ी कार्रवाई करनी चाहिए।
भारतीय मीडिया फाउंडेशन के संस्थापक एके बिंदुसार में बाल अधिकारों के संरक्षण पर प्रकाश डालते हुए बताया कि इसके लिए आयोग (सीपीसीआर) अधिनियम, 2005
बाल अधिकारों के संरक्षण के लिए आयोग (सीपीसीआर) अधिनियम, 2005
सीपीसीआर अधिनियम की धारा 13 में भारत के संविधान में बच्चों को कई अधिकारों की गारंटी दी गई है, जैसे कानून से पहले समानता, मुफ्त और अनिवार्य कानूनी संरक्षण, छह से चौदह वर्ष की आयु के बच्चों को मुफ्त और अनिवार्य प्राथमिक शिक्षा, बच्चों की तस्करी और जबरन मजदूरी पर रोक और कारखानों एवं खतरनाक व्यवसाय में चौदह वर्ष से कम उम्र के बच्चों के रोजगार पर प्रतिबंध। संविधान राज्य सरकारों को बच्चों के लिए विशेष प्रावधान करने में सक्षम बनाता है और निर्देश देता है कि राज्य की नीति ऐसी होगी कि उनकी निविदा आयु का दुरुपयोग न किया जाए। सरकार आवश्यक स्वतंत्रता और सम्मान के साथ बच्चों को स्वस्थ वातावरण में विकसित करने के लिए अवसर और सुविधाएं देने के लिए प्रतिबद्ध है, और यह सुनिश्चित करने के लिए कि उनके संवैधानिक और कानूनी अधिकार सुरक्षित हैं।कई सामाजिक कार्यकर्ताओं,वैज्ञानिकों और गैर-सरकारी संगठनों ने बच्चों के अधिकारों को प्रोजेक्ट करने के लिए एक राष्ट्रीय आयोग की आवश्यकता पर जोर दिया।जिस पर सरकार ने उनके अधिकारों की बेहतर सुरक्षा के लिए राष्ट्रीय आयोग का गठन करने का निर्णय लिया सरकार के निर्णय को लागू करने के लिए संसद में सीपीसीआर विधेयक पेश किया गया था। सीपीसीआर बिल, 2005 को 21 दिसंबर, 2005 को लोकसभा द्वारा, 22 दिसंबर, 2005 को राज्य सभा द्वारा पारित किया गया और 20 जनवरी, 2006 को राष्ट्रपति की सहमति प्राप्त हुई।
उन्होंने कहा कि भारत में बाल अपराध एवं शोषण एक गंभीर विषय बनता जा रहा है अभी तक कल कारखानों एवं अन्य व्यवसायों में ही शोषण की घटनाएं मिलती थी लेकिन अब खुलेआम राजनीति में भी बालकों के मानवाधिकारों का हनन किया जा रहा है खुलेआम शोषण किया जा रहा है जिसका प्रमाण वर्तमान में दिल्ली में देखने को मिल रहा है।
श्री एके बिंदुसार ने केंद्र सरकार से कड़ी कार्रवाई की मांग करते हुए देश के समस्त पत्रकार बंधुओं एवं सामाजिक कार्यकर्ताओं से भी इस प्रकरण पर निष्पक्ष तरीके से डिबेट करने की अपील की है।