
लीडरशीप
शिक्षा, पराक्रम और बलिदान के सच्चे प्रतीक ‘नेताजी ’
आधुनिक समय में प्रबंधन के अनेक पाठॺक्रम लीडरशीप के अनेक सिद्धांतों की चर्चा करते हैं। ग्रेटमैन थ्योरी, ट्रांसफॉर्मेशनल लीडरशिप थ्योरी, रिलेशनशिप थ्योरी या बिहेवियरल थ्योरी से जुड़े पाठॺक्रम पूरे संसार में युवा पढ़ते हैं, लेकिन वह बालक, जिसका जन्म 23 जनवरी, 1897 को ओडिसा के कटक में हुआ, वह तो अपने पराक्रम से मानो लीडरशिप की संस्था ही बनने आया था। माता प्रभावती और जानकी नाथ बोस के सुपुत्र ने बड़े होकर भारत के युवाओं को प्रेरित करते हुए जो कहा, वही उसका सदा के लिए परिचय बन गया। उन्होंने नौजवानों से साहस मांगा और कहा, तुम मुझे खून दो, मैं तुम्हें आजादी दूंगा।
लीडर या नेता का सबसे बड़ा गुण उसके अंदर का साहस और दृष्टि होती है। आज के युवाओं को उनकी निर्णय लेने की शक्ति से सीखना चाहिए। उनके सारे फैसले साहस और पराक्रम से भरे थे। उन्होंने महज 16 की उम्र में अपने अंग्रेज शिक्षक को अन्याय करने से रोका था और हमेशा के लिए सुधार दिया था। कहा जाता है, एक बार एक शिक्षक ने उनसे पूछा, ‘एक रेलवे स्टेशन मास्टर और एक शिक्षक में क्या फर्क है?’ उन्होंने जवाब दिया, ‘वन ट्रेंस द माइंड ऐंड वन माइंड्स द ट्रेन’। उस जमाने में सिविल सर्विसेज की तैयारी करना, लंदन जाकर परीक्षा देना और उत्तीर्ण होना कोई आसान बात नहीं थी। इस परीक्षा में सुभाष चंद्र बोस को चौथा स्थान हासिल हुआ था, पर उस पद को छोड़ने में उन्हें पल भर भी देर नहीं लगी। जब देश ने पुकारा, तो सुभाष दीवानों की तरह आजादी की जंग में कूद पड़े।
वह स्वामी विवेकानंद से बहुत प्रभावित थे। उनके अंदर का विवेक सदैव जागृत रहता था, इसलिए वह भारतीय स्वतंत्रता संग्राम का हिस्सा ही नहीं बने, बल्कि बहुत कम समय में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के अध्यक्ष भी बन गए। वह पूर्ण स्वतंत्रता चाहते थे, पर तब कांग्रेस डोमिनियन स्टेटस की मांग कर रही थी। आगे की दिशा उलझी हुई नजर आई, तो वह इस पद को छोड़ने में भी नहीं हिचके। वह जल्द ही आजादी के पक्ष में थे और ज्यादा समय तक हाथ पर हाथ धरे बैठना नहीं चाहते थे।
वह गांधीजी का सम्मान करते थे, पर अपने वैचारिक मतभेद को छिपाया नहीं। उन्होंने आजाद हिंद फौज का गठन किया और बर्मा के साथ ब्रिटिश सत्ता के खिलाफ युद्ध का नेतृत्व किया। उनका कद इतना बढ़ता गया कि उनके अनुयायियों ने हमेशा प्यार और सम्मान के साथ उन्हें ‘नेताजी’ पुकारना शुरू कर दिया। अगर हम स्वतंत्रता संग्राम के पन्नों को पलटें, तो पाएंगे कि महात्मा गांधी के नेतृत्व ने अंग्रेजी औपनिवेशिक सियासत की नींद उड़ा दी थी, लेकिन अगर हम पूर्व ब्रिटिश पीएम क्लेमेंट एटली के वक्तव्य को याद करेंगे, तो उन्होंने यह कहा था कि ‘यह मुख्य रूप से बोस और आईएनए विद्रोह था, जिसने अंग्रेजों को भारत छोड़ने के लिए मजबूर किया’।
आज के राजनीतिक परिदृश्य में नेताजी के लीडरशिप और जीवन मूल्यों की प्रासंगिकता ज्यादा बढ़ जाती है। वह कमाल के व्यावहारिक इंसान थे। 6 जुलाई, 1944 को जब उन्होंने आजाद हिंद रेडियो से महात्मा गांधी को ‘राष्ट्रपिता’ के रूप में संबोधित किया, मानो उन्होंने भारत की स्वतंत्रता के इस अंतिम युद्ध के लिए गांधी का आशीर्वाद मांगा। आज भी हमें उनसे आत्मविश्वास, साहस, फैसला लेने की शक्ति, संगठनात्मक कला, जीवन मूल्य आदि सभी लीडरशिप हुनर से परिचित होने का मौका मिलता है। कई लोग आज भी महिलाओं को कमजोर समझते हैं, लेकिन सुभाष चंद्र बोस ने आजाद हिंद फौज में झांसी की रानी रेजिमेंट का गठन किया था, जो दुनिया की पहली महिला रेजिमेंट थी। ऐसी कोई महिला सैन्य रेजिमेंट भारत में अलग से आज भी नहीं है।
वह अपने परिवार के बच्चों में ‘काकाबाबू’ नाम से संबोधित किए जाते थे। एक बार जब उनकी भतीजी अपने सांवले रंग से परेशान दिखी, तो उनके काकाबाबू ने गुरुदेव टैगोर की कविता पढ़ी, अंधेरा! चाहे वह कितना भी काला क्यों न हो, मैंने उसकी हिरण समान काली आंखों को देखा है! कितने संवेदनशील थे हमारे नेताजी। तभी तो महात्मा गांधी ने 12 फरवरी, 1946 को हरिजन में लिखा, ‘नेताजी और उनकी सेना हमें आत्म-बलिदान, एकता और अनुशासन का पाठ पढ़ाती है’।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)