लोहड़ी से पोंगल तक उत्सव मनाती भारतीय संस्कृति, रिपोर्ट योगेश मुदगल

सूर्य देव का महात्म्य है ही ऐसा। वह भारत ही नहीं, पूरी कायनात को समदर्शी भाव से अपना प्रकाश, अपनी ऊष्मा देते हैं। मान्यता है कि इसी दिन सूर्य का मकर राशि में प्रवेश होता है।
कथी लय पुजलौं सीया सांझ तुषारी/ कथी लय पुजलौं गौरा दाई हे, यानी संध्या पूजन, प्रात पूजन किसलिए कर रही हो सिया, किसलिए मां गौरी की पूजा? पौष संक्रांति से पूजन शुरू किया था संध्या गौरी का हेम-क्षेम के लिए। चौकोर गोबर लिपे आंगन में सूखे चौरठ (चावल का सूखा आटा) से लिखा जाता अल्पना, उस पर स्थापित गौरी। मिट्टी के चूल्हे पर पकता व्यंजन सूर्य के निमित्त। यह है संध्या गौरी का पूजन, जो मैंने किया। पढ़ाई-लिखाई के कारण जो मैंने नहीं किया, लेकिन हमारी पीढ़ी की लड़कियों ने किया, वह है तुषारी गौरी पूजन, जिसे इसी प्रकार अगहन की संक्रांति से पौष की संक्रांति तक किया जाता है। मान्यता है, गौरी को भी सूर्य के आगमन पर तुषारी व संध्या-पूजन करना पड़ा था।
सूर्य देव का महात्म्य है ही ऐसा। वह भारत ही नहीं, पूरी कायनात को समदर्शी भाव से अपना प्रकाश, अपनी ऊष्मा देते हैं। कहते हैं, इस दिन सूर्य का मकर राशि में प्रवेश होता है। वह मकर के स्वामी अपने पुत्र शनि के पास जाते हैं, तिल और गुड़ का प्रसाद पाने। दो बातें होती हैं- सूर्य इसी दिन उत्तरायण होते हैं, और उनकी उपस्थिति बढ़ती है धरती पर। अन्य तमाम पर्व-त्योहार की तरह मकर संक्रांति भी कृषि आधारित त्योहार है। इस समय नया धान खेतों से घर आता है। दलहन के कुछ प्रकार भी आते हैं। नया गुड़ तैयार होता है और तिल खेत से खालिहान आता है। धान का चावल, फरही (लइया), चिवड़ा तैयार होता है। गुड़ के साथ तिल के व्यंजन बनते हैं। नए चावल और उड़द, कुल्थी दाल की खिचड़ी पकती है। आलू, गोभी, मटर, टमाटर जैसी अनेक प्रकार की सब्जियों का यह मौसम रहता है, सो ये खिचड़ी के मुफीद भी हैं।
इस दिन बिहार में दही-चूड़ा, तिलवा का भी खासा महत्व है। यही सौगात बेटियों के यहां (ससुराल) नैहर से भेजा जाता है, जबकि उत्तर प्रदेश में खिचड़ी का सामान सौगात में जाता है। बिहार के मिथिलांचल में नव-विवाहिताएं यदि मायके में रहें, तो पूरे माह संध्या पूजन भी करती हैं। मकर संक्रांति के दिन लौकी-साग और भात पकाकर चौदह सुहागिनों के साथ भोजन करती हैं। इस त्योहार को भतराशि कहते हैं। इस दिन लोग सुबह-सुबह स्नान कर तिल की, लकड़ी की आग सेंकते हैं।
पंजाब में संक्रांति की पूर्व संध्या पर लोहड़ी का त्योहार मनाते हैं, जिसमें खुले में अलाव जलाकर तिल, मूंगफली, खील, बताशे आदि अग्नि को समर्पित करते हैं। भांगड़ा और गिद्दा नाचते हैं। असम में यह त्योहार बीहू की तरह मनाते हैं, जिसे माघ बीहू कहते हैं। राजस्थान में चौदह सौभाग्य-सूचक वस्तुओं को सास कोटि की स्त्रियों या ब्राह्मण को दान किया जाता है। उत्तराखंड में आटे की आकृति बनाकर बच्चे कागा को खिलाते हैं, जिसे वे घुघुतिया कहते हैं। तमिलनाडु में यह सबसे विशद रूप में चार दिनों तक मनाया जाता है, जिसकी शुरुआत सम्मत जलाने से होती है। फिर, लक्ष्मी और पशुधन की पूजा होती है। चौथे दिन स्नान करके खुले आंगन में खीर पकाते हैं, जिसे पोंगल कहते हैं। सूर्य देव को नैवेद्य चढ़ाकर लोग प्रसाद पाते हैं। जम्मू में भी खिचड़ी ही मुख्य प्रसाद है। आंध्र और तेलंगाना में विशेष और विस्तृत भोजन का प्रावधान है। बंगाल में तिल और नारियल के व्यंजन बनते हैं। बंगाल में ही गंगासागर में देश का सबसे बड़ा मेला लगता है। यहां तक की यात्रा श्रद्धालुओं के लिए कष्टकारी रही है, तभी तो कहा गया है- सारे तीरथ बार-बार, गंगासागर एक बार। इस दिन गोरखपुर में गोरखनाथ मंदिर में खिचड़ी दान होती है। केरल में संक्रांति को मकर विलक्कू कहा जाता है। सबरीमाला मंदिर में भक्तगण अयप्पा की पूजा करते हैं, जो सुबह तीन बजे शुरू होती है। पोन्नम्बलमेडु पहाड़ी पर ज्वाला देखकर वे पर्व मनाते हैं। आकाश में तारा मकर ज्योति दिखाई देती है, तब माना जाता है कि स्वयं भगवान अयप्पा स्वामी दिव्य प्रकाश के रूप में अपना आशीर्वाद दे रहे हैं।
बहरहाल, यह पूस की दुसह ठंडी रातों के अंत की शुरुआत का त्योहार भी है। आम बोलचाल में लोग कहते हैं कि सूर्य मकर के दांत से निकले हैं। मकर यहां कोहरे का प्रतीक प्रतीत होता है। कई जगह खुशी प्रकट करने का अलग-अलग तरीका देखा गया है। बहुत स्थान पर पतंग उड़ाने की भी परंपरा है। गुजरात की पतंगबाजी तो अब व्यापक हो चली है। देखा जाए, तो अपनी संस्कृति का सम्मान है ऋतु परिवर्तन का यह देशव्यापी त्योहार।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)