बर्बरता, यात्रा और उम्मीद का वर्ष

बर्बरता, यात्रा और उम्मीद का वर्ष*

सियासत से समाज और पुलिस तक बहुत उथल-पुथल भरा रहा साल 2022, खत्म होते-होते राजधानी दिल्ली समेत कई शहरों में हिंसा के *बर्बरतम उदाहरण देखने को मिले*
2022 खत्म होने के बाद सिर्फ एक गया साल होकर नहीं रह जाएगा। कुछ है, जो इसे हमारी स्मृतियों में लंबे समय तक टांककर रखेगा। कोविड ने पिछले दो-ढाई वर्षों तक सारी गतिविधियों को किसी गुंजलक में जकड़ सा रखा था, दिसंबर आते-आते कई वर्जनाएं टूट सी गईं और कोविड-पूर्व की सड़कें, बाजार, मंदिर, मस्जिद या पर्यटक स्थल दिखने लगे। यह तो कोई अर्थशास्त्री उपलब्ध आंकड़ों को खंगालकर बता पाएगा कि किस हद तक सही है, पर एक सामान्य उपभोक्ता भी कह सकता है कि 2019 के पहले का समय लौट आया है। यह अलग बात है कि साल खत्म होते-होते चीन से आने वाली खबरें नए स्वरूप वाले कोरोना की आहट से डराने लगी हैं।

पिछले सात-आठ वर्षों में देश क्षैतिज रूप से विभक्त हुआ है। परस्पर संवाद में बीच की जगह सिकुड़ गई है। यह एक ऐसी स्थिति है, जिसे बिना इस बहस के कि यह लोकतंत्र के लिए अच्छी है या बुरी, स्वीकार करना होगा। राष्ट्रीय विमर्श के लिए भारतीय भाषाओं को एक नया शब्द मिला- ‘भक्त’। एक विभक्त समाज में जैसी अपेक्षा की जा सकती थी, उसका विमर्श सारी भाषिक मर्यादाओं को तोड़कर हुआ। खासतौर से संवाद के अपेक्षाकृत नए, मगर ज्यादा प्रभावी माध्यम सोशल मीडिया पर तो ‘खुला खेल फर्रुखाबादी’ हो गया। ज्यादातर जगह संपादक जैसी संस्था के मजबूत न होने पर जिस आत्मानुशासन की अपेक्षा की जाती है, उसका सर्वथा अभाव दिखा और ट्विटर-फेसबुक पर खूब गाली-गलौज चली। ऐसे में, साल खत्म होते-होते एक यात्रा ने देश का ध्यान आकर्षित किया और 2022 की किसी एक सर्वाधिक चर्चित घटना का उल्लेख करना हो, तो उसका जिक्र होगा।

राहुल गांधी की ‘भारत जोड़ो यात्रा’ ऐसी ही एक यात्रा है, जो निरंतर मंथर गति से चलती रही। लोगों ने इसे संशय, कई बार निराशा, कुछ-कुछ अतिरिक्त उत्साह और बहुत सारे मौकों पर भ्रम के साथ देखा। इस बीच देश के कुछ राज्यों में चुनाव हुए। यात्रा की खुद को चुनावों से निरपेक्ष रखने की अदा ने भी पर्यवेक्षकों को उलझन में रखा। खासतौर से पहले लग रहा था कि गुजरात चुनाव में भी यात्रा का हस्तक्षेप दिखेगा, लेकिन नतीजों ने चकित किया। यह अलग बात है कि इन चुनावों में गुजरात, हिमाचल और दिल्ली, तीन अलग-अलग दलों को मिल गए और एक बार फिर हमें भारतीय मतदाता की प्रौढ़ता का लोहा मानना पड़ा। मगर भारत जोड़ो यात्रा को एक श्रेय देना पड़ेगा कि इसने विमर्श के ताप को काफी हद तक कम कर दिया है। बिना लाउड हुए इसने मोहब्बत की बातें कीं। एक राजनीतिक व्यक्ति की यात्रा के राजनीतिक निहितार्थ तो होंगे ही, पर अभी से कुछ कहना संभव नहीं है कि 2024 के चुनावों के नतीजों को यह यात्रा किस तरह से प्रभावित करेगी।

साल खत्म होते-होते राजधानी दिल्ली समेत कई शहरों में हिंसा के बर्बरतम उदाहरण देखने को मिले। पहली बर्बरता हुई मुंबई की एक लड़की के साथ, जिसके ‘लिव-इन पार्टनर’ ने संबंध खराब होने पर उसके शरीर के टुकड़े-टुकड़े कर शहर से सटे जंगल में बिखेर दिए। कई महीनों तक लापता रहने के बाद जब हत्या की बात सामने आई, तो देश स्तब्ध रह गया। इस पर तुर्रा यह कि दोनों अलग-अलग धर्मों के थे। इस समय राष्ट्रीय विमर्श में प्रचुर मात्रा में प्रयोग में आने वाले शब्द ‘लव जेहाद’ को एक जरखेज जमीन मिल गई। गनीमत यह हुई कि पुरुष मित्र की गिरफ्तारी के दूसरे ही दिन इसी अखबार में पिछले चंद वर्षों में दिल्ली महानगर और उसके आसपास की चार बड़ी घटनाओं का विस्तार से जिक्र छपा था और इन सभी मे अपराधी गैर-मुस्लिम थे। सभी में सामान्य बात यही थी कि किसी स्त्री के शरीर को उसके पुरुष साथी ने क्रूरतम तरीके से काट डाला था और किसी में कटे अंगों को जलाकर और कहीं जंगलों या नदी-नालों में बहाकर नष्ट करने की कोशिश की गई थी।

एक पितृ-सत्तात्मक समाज में स्त्रियों के साथ किसी न किसी रूप में हिंसा होना समझ में आ सकता है, लेकिन जिस क्रूरता का परिचय पिछले दिनों देश के अलग-अलग हिस्सों में मिला, वह स्तब्ध कर देने वाला था। यह क्रूरता अब तक कहां छिपी थी या कैसे एक मन इतना कठोर हो जाता है कि वर्षों के रागात्मक संबंधों को एक झटके से तोड़ता हुआ अपने वर्षों के साथी के शरीर के टुकड़े-टुकड़े कर डालता है, यह बड़े समाजशास्त्रीय अध्ययन का विषय हो सकता है। कुछ घटनाएं ऐसी भी हुईं, जिनमें स्त्रियां हत्यारिन थीं और इनमें भी अपराध के चिह्न मिटाने के लिए शव के टुकड़े-टुकड़े कर नष्ट करने के प्रयास किए गए। शव के निस्तारण का यह तरीका फिल्मों व टीवी सीरियलों से सीखा गया था और लगभग सभी में तेज धार वाले चाकू, फ्रिज और थैलों का उपयोग किया गया। खून के धब्बों को मिटाने का प्रशिक्षण भी नेट पर उपलब्ध था। ज्यादातर मामलों में डीएनए टेस्टिंग से शिनाख्त हो पाई और मोबाइल की लोकेशन या कॉल रिकॉर्डिंग से अपराधी तक पहुंच बनी। एक तरह से तफ्तीश में वैज्ञानिक उपकरणों की उपयोगिता साबित हुई।

बिना अपवाद, सभी मामलों में शुरू में लापरवाही बरती गई। पहले अपनी आदत के अनुसार राज्य पुलिस ने मुकदमे दर्ज नहीं किए और शिकायतकर्ता को भगाने की कोशिश की। मगर बार-बार दुत्कारने के बाद, जब पीड़ित डट गया, तो पुलिस कार्रवाई शुरू हुई। यदि पुलिस पहली सूचना मिलने पर सक्रिय हो जाती, तो कई जान बच सकती थीं। यहां फिर व्यापक पुलिस सुधारों की चर्चा की जा सकती है। दुर्भाग्य से इस साल भी सभी सत्तारूढ़ दल पुलिस बलों के दुरुपयोग में लगे रहे और अलग-अलग राज्यों से नागरिक अधिकारों के हनन की शिकायतें आती रहीं।

पुलिस सुधारों की दृष्टि से एक महत्वपूर्ण घोषणा इस वर्ष जरूर हुई। गृह मंत्री अमित शाह ने सीआरपीसी में संशोधन कर फॉरेंसिक विज्ञान को अनुसंधान का अनिवार्य अंग बनाने की घोषणा की है। देखना है कि केंद्र और राज्य सरकारें कितनी गंभीरता से इसे लेती हैं, और इस मद में कितना धन आवंटित करती हैं। जिन जघन्य हत्याओं का जिक्र ऊपर हुआ, उन सबकी तफ्तीशों में फॉरेंसिक विज्ञान ने ही मदद की है।

(ये लेखक के अपने विचार हैं)

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निशाकांत शर्मा (सहसंपादक)

यह खबर /लेख मेरे ( निशाकांत शर्मा ) द्वारा प्रकाशित किया गया है इस खबर के सम्बंधित किसी भी वाद - विवाद के लिए में खुद जिम्मेदार होंगा

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