आशुतोष राना जी लिखित “रामराज्य “ केवल एक पुस्तक नहीं है । न धार्मिक ,न आध्यात्मिक – ये जीवन दर्शन भी है , कई प्रश्नों का उत्तर भी है । आशुतोष जी लिखते हैं —
मर्यादा पुरूषोत्तम श्री राम का विश्वास साधनों में नहीं ,साधना में है । वे साधन सम्पन्न होने की चाह से नहीं साधना सम्पन्न होने की चाहत से भरे हैं । वे शासन के नहीं , अनुशासन के पक्षधर हैं । “
सच , राम को नारों से नहीं पाया जा सकता । इस ‘रामराज्य ‘में आशुतोष जी ने प्रथम अध्याय कैकेयी से प्रारम्भ किया है ।
क्या सच में माता कैकेयी वही हैं जो हम देखते सुनते आए …
सुपर्णा-शूर्पणखा , पंचवटी ,लंका , हनुमान विजय पर्व , कुम्भकर्ण , रावण , विभीषण और अंत में सीता परित्याग —-
अभी मैंने पूरी पढ़ी नहीं है ,किंतु जिज्ञासा नए प्रकाश की ओर ले जाती महसूस हो रही है ,
एक नए दृष्टिकोण से रामराज्य को हमें जानना है ।
बधाई और शुभकामनाएँ आशुतोष जी को —
