
समाज सेवा एवं पत्रकारिता व्यवसाय नहीं , राष्ट्रवादी-जन कल्याण वादी धर्म है।
पत्रकारिता आधुनिक सभ्यता का एक प्रमुख सामाजिक कार्य है, जिसमें समाचारों का एकत्रीकरण, लिखना, जानकारी एकत्रित करके पहुँचाना, सम्पादित करना और सम्यक प्रस्तुतीकरण आदि सम्मिलित हैं ।
आज के युग में समाज सेवा व पत्रकारिता के भी अनेक माध्यम हो गये हैं; जैसे – अखबार, पत्रिकायें, रेडियो, दूरदर्शन, वेब-पत्रकारिता आदि।आज प्रायः देखा जा रहा है कि पत्रकारिता का क्षेत्र हो या समाज कार्य का क्षेत्र दोनों क्षेत्रों में निर्भीकता की जगह एक अजीब सा, असहनीय सा स्तर, हीन सा बदलाव आता जा रहा हैं। मेरी एक समझ थी कि न्यायाधीश और पत्रकार सटीक तथ्य प्रगट करते हैं। इतिहास गवाह है एक जमाने में किसी भी समाचार पत्र में छपी किसी भी खबर को कोई चैलेन्ज नहीं करता था और अगर ऐसी नौबत आ भी जाती थी तो जब परिणाम आता तो पत्रकारिता की जय जयकार ही होती थी।
किसी शहर में किसी भी तरह का कोई कार्यक्रम होता था तो उसमें मुख्य अतिथि जैसे गरिमावान सम्मान के लिए जिन महानुभावों की सूची होती थी उसमें पत्रकार बंधुओं का समावेश भी होता था।
आज तस्वीर बिलकुल उलट गई है पत्रकारिता की अनेक श्रेणियां हो गई हैं। सरकारी पत्रकार, राजनैतिक पत्रकार ( इसमें भी अलग अलग दलों से सम्बंधित ), क्रिमनल रिपोर्टर, फ़िल्मी … डकैती …. माफिया …. व्यावसायिक ( इसमे भी शेयर, औद्योगिक, खनिज, सट्टा … और भी न जाने क्या क्या ) …..लम्बी जमात बन गई है।
फिर सबसे बड़ा परिवर्तन तो “इलेक्ट्रॉनिक मीडिया और प्रिंट मीडिया” ये दो विभाग हो गए हैं। एक बात और …. पहले पत्रकार फिर रिपोर्टर और अब सपोर्टर …. शब्द ही बदल गए ….दिशा ही बदल गई।
मजे की बात तो यह रही कि इस “मीडिया जाति” में भी व्यावसायिक कंपटीशन चल पड़ी, कौन सी मीडिया के पास कौन सा “सिक्का” है। यह अतिमहत्वपूर्ण नज़रिया हो गया, कौन सा सिक्का कल किस चैनल पर नज़र आयेगा।
हाँ, कौन कितना कमाऊ पूत है, कितने घरानों के विज्ञापन लाता है, कितनी निर्दयता से पेश होकर सामनेवाले का मुह खुलवाता है, कैसे बात को बिना बात का मोड़ दे देता है, बेगुनाहगार को गुनाहगार, गुनाहगार को वेगुनाहगार साबित कर देता है …… यह अति महत्वपूर्ण हो गया है। दूसरी बात – जो जिस महकमे का माहिर है उसमें कितने अन्दर तक घुस कर “बात” संभाल सकता है, उस महकमें पर कोई और किसी भी प्रकार का आंच नहीं आने देता है यह भी काबिलेतारीफ करतब हो गया है …. भले ही उसे अपने अन्दर के जमीर का कितनी ही बार क़त्ल करना पड़े। आज हर स्वार्थी तत्व पत्रकार के आगे भिगी बिल्ली की तरह दुम हिलाता रहता हैं। क्योंकि वह जानता है कि इतने से ही काम तो निकल रहा है।
इसलिए कुछ सवाल तो खड़े होंगे-
क्यों पत्रकार की प्रबुद्धता पर यह सवाल खडा हो रहा है कि दुम हिलाने से ……
ये क्या हो रहा है ? यह बिलकुल सत्य बात है कि प्रजातंत्र का एक मजबूत पाया पत्रकार होता है। उसकी बात की अहमियत भी एक न्यायाधीश से कहीं भी कम नहीं होती। हमें बार बार रटाया जा रहा है कि प्रजातंत्र की एक पाया ” मीडिया ” है परंतु यह बिलकुल गलत बात है। वर्तमान परिवेश में समाचार संस्थान तो एक प्रकार का व्यावसायिक घराना भर रह गया है पूरा दारोमदार तो सामाजिक कार्यकर्ताओं पर हैं।
मीडिया को अपने असली रूप में आना होगा अपने पत्रकारिता धर्म को पहचानना होगा।
मैं दृढ़ता पूर्वक कहना चाहता हूँ कि जिस तरह न्यायाधीश का न्याय करना पेशा नहीं बल्कि धर्म है ठीक उसी तरह सामाजिक कार्यकर्ताओं एवं पत्रकार पेशेवर नहीं बल्कि समाज के जिम्मेदार प्रहरी हैं होना भी चाहिए, यह उसका सेवा भाव होना चाहिए।
वर्तमान समय में एक नई विडम्बना है कि आज साधू , फ़कीर , अध्यापक …. सभी प्रोफेशनल हो गए हैं …. नेताओं की बात करना तो निरर्थक सा हो गया है। क्या सैनिक सीमा पर केवल पैसों के लिए खडा रहता है ? नहीं – बिलकुल नहीं …उसकी रगों में देश की रक्षा का जज्बा भी भरा होता है, नौकरी के पैसे तो वह परिवार के भरण पोषण के लिए लेता है। इस सच्चाई को हम झुठला नहीं सकते। पेशेवर होना कोई बुरा नहीं है परन्तु अपने में निहित “कर्तव्यों ” को किसी भी हालत में त्यागना उचित बात नहीं है।
हमारे अन्दर ” मनुष्यत्व ” है।
इस मनुष्यत्व से च्युत होने पर हमारे ऊपर “पशुता” का आक्षेप लग जाता हैं।
बदलना होगा अपने स्वभाव को ! इस बदलाव में प्रबुद्ध पत्रकार, समाज सेवा की महत्वपूर्ण रोल होना चाहिए, जिस तरह शिक्षा में गुरु, धर्म गुरु पथप्रदर्शक होते हैं ठीक उसी तरह सांसारिक गतिविधियों का ज्ञान भी पत्रकार व समाज सेवक के माध्यम से ही संभव हैं।
कृपया बदलाव की कहीं से तो शुरुआत करें।
जय हिन्द जय भारत विजय भारत।।
भारतीय मीडिया फाउंडेशन जिंदाबाद।