
!!.यूपी का चुनावी रण:अदिति सिंह की पारिवारिक सीट पर उलझे समीकरण, रायबरेली विधानसभा क्षेत्र में सपा प्रत्याशी आरपी यादव दे रहे चुनौती.!!
रायबरेली विधानसभा क्षेत्र में अदिति सिंह भाजपा, डॉ. मनीष सिंह चौहान कांग्रेस, आरपी यादव सपा व मो. अशरफ बसपा के खिलाड़ी
कांग्रेस से विधायक बनकर योगी सरकार का गुणगान करने वाली अखिलेश सिंह की बेटी अदिति सिंह इस बार भाजपा से मैदान में हैं। वहीं, वर्ष 2012 में शिकस्त झेलने के बाद आरपी यादव सपा से फिर अखाड़े में जोर आजमाइश कर रहे हैं।
कभी कांग्रेस या यूं कहें कि असरदार नेेता अखिलेश सिंह का गढ़ रही रायबरेली सदर विधानसभा सीट का चुनावी मिजाज इस बार जुदा है। चुनावी पिच पर नए और पुराने खिलाड़ी हैं, लेकिन पिछले चुनाव के मुकाबले जातीय समीकरण उलट पलट गए हैं। कांग्रेस से विधायक बनकर योगी सरकार का गुणगान करने वाली अखिलेश सिंह की बेटी अदिति सिंह इस बार भाजपा से मैदान में हैं। वहीं, वर्ष 2012 में शिकस्त झेलने के बाद आरपी यादव सपा से फिर अखाड़े में जोर आजमाइश कर रहे हैं। कांग्रेस नए चेहरे डॉ. मनीष सिंह चौहान के बूते अपने ही गढ़ में नैया पार लगाने के लिए संघर्ष कर रही है। वहीं, मो. अशरफ बसपा की साख बचाने के लिए दमखम लगा रहे हैं। ये सभी ब्राह्मण, यादव, क्षत्रिय और मुस्लिम वोटों के बल पर विधानसभा पहुंचने की राह देख रहे हैं।
एक वक्त था, जब सदर विधानसभा सीट पर सिर्फ विधायक अखिलेश सिंह की तूती बोलती थी। सदर से वह पांच बार विधायक रहे। छठवीं बार बेटी अदिति सिंह को विधायक बनाया। इस सीट पर करीब चार दशक से इसी परिवार का कब्जा है। पहले इसी परिवार के अशोक सिंह अलग अलग दलों से सांसद, विधायक बनते रहे। इसके बाद अखिलेश सिंह कभी कांग्रेस, तो कभी निर्दलीय या फिर पीस पार्टी से विधायक बने। 2017 में अखिलेश ने बेटी अदिति को कांग्रेस के टिकट पर उतारा और विधायक बनाया। तब सपा ने उम्मीवार नहीं उतारा। लिहाजा पिता के दमखम और सपा का सहयोग मिलने से अदिति रिकाॅर्ड मतों से जीतीं। इस बार न तो पिता हैं और न ही सपा का सहारा। ऐसे में अदिति का जातीय समीकरण उलझा है। धीरे धीरे यहां का चुनाव त्रिकोणीय होता जा रहा है। वोटों का ध्रुवीकरण करने की कोशिश भी परवान चढ़ रही है।
खास बात यह है कि सपा प्रत्याशी आरपी यादव 2012 में अदिति के पिता अखिलेश सिंह के सामने चुनाव लड़े चुके हैं। इस बार वे अदिति को चुनौती दे रहे हैं। इस वजह से यह चुनाव और रोमांचक हो गया है। वर्ष 2017 में अदिति के सामने भाजपा से अनीता श्रीवास्तव चुनाव मैदान में थीं, लेकिन हार गई थीं। सदर विधानसभा सीट का ऐतिहासिक महत्व भी है, क्योंकि यहीं पर दूसरा जलियावाला कांड हुआ था। सई नदी के किनारे निहत्थे किसानों पर अंग्रेजों ने गोलियां बरसाई थीं। यहां पर लोगों की धार्मिक आस्था भी अपना एक अलग महत्व रखती है।