जन्माष्टमी से जुड़ी मुख्य खबर…
“जन्माष्टमी पर दो तिथियां: आस्था में गणित का बंटवारा”

“भाद्रपद की अष्टमी आते ही देशभर के मंदिरों में श्रीकृष्ण जन्म की तैयारियां चरम पर हैं। मथुरा से लेकर द्वारका तक, वृंदावन से लेकर जगन्नाथपुरी तक—हर जगह कान्हा के दरबार सज रहे हैं, झांकियां बन रही हैं, भजन-कीर्तन गूंज रहे हैं। लेकिन इस भक्ति के बीच एक सवाल चुपचाप अपना असर छोड़ रहा है—कृष्ण जन्मोत्सव आखिर किस दिन मनाएं? 15 अगस्त या 16 अगस्त? वही प्रश्न जो हर साल नए सिरे से उठता है और भक्तों को दो खेमों में बांट देता है। जिस पर्व को प्रेम और एकता का प्रतीक होना चाहिए, क्या वह अब तिथियों के विवाद का मैदान बनता जा रहा है?”
भक्ति में उलझा कैलेंडर…..
श्रीकृष्ण जन्माष्टमी, जो भक्ति और आनंद का प्रतीक है, इस बार भी एक पुराने विवाद में उलझी है। कहीं 15 अगस्त को झांकियां सजेंगी, तो कहीं 16 अगस्त को। भक्तों के मन में सवाल है—उपवास कब रखें और जन्मोत्सव कब मनाएं? तिथियों का यह अंतर कई घरों में अलग-अलग राय तक ले आया है।
गणित बनाम भावना…..
विद्वान बताते हैं कि कृष्ण जन्माष्टमी तय करने के लिए अष्टमी तिथि और रोहिणी नक्षत्र का मेल जरूरी है। लेकिन अलग-अलग पंचांग इस मेल को लेकर सहमत नहीं हैं—कुछ तिथि को प्राथमिक मानते हैं, कुछ नक्षत्र को। यह बहस अपने-अपने तर्कों पर टिकी है, पर भक्तों के लिए सबसे बड़ा महत्व एक साथ पर्व मनाने का है।
तिथि-राजनीति का असर…..
दीपावली, होली और ईद पूरे देश में एक दिन होती हैं, तो जन्माष्टमी क्यों नहीं? दो-दो दिन पर पर्व बंटने से उत्साह और एकता कमजोर होती है। कहीं पहले दिन झांकियां निकलती हैं, तो कहीं दूसरे दिन। यह असमानता हमारी सांस्कृतिक छवि को भी धुंधला करती है।
संस्कृति की बंटती छवि…..
एक पर्व, दो दिन—यह कैलेंडर का फर्क भर नहीं, बल्कि हमारी एकता पर सवाल है। जब विदेशों में लोग देखते हैं कि एक ही त्योहार अलग-अलग दिन मनाया जा रहा है, तो हमारी छवि बंटी हुई दिखती है। कृष्ण जन्माष्टमी प्रेम और सामूहिक उल्लास का संदेश देती है, और इसे एक साथ मनाने से ही उसका असर गहरा होगा।
समाधान की राह…..
जरूरत है एक राष्ट्रीय धार्मिक पंचांग समिति की, जिसमें विद्वान और खगोलशास्त्री मिलकर एक ही तिथि तय करें। इससे न सिर्फ जन्माष्टमी बल्कि अन्य पर्वों में भी एकरूपता आएगी। आस्था का असली मकसद भक्ति और एकता है—और यही श्रीकृष्ण की शिक्षा भी थी।