
प्रदेशभर में रोज़ाना लाखों बच्चे स्कूल जाने के लिए अलग-अलग माध्यमों का सहारा लेते हैं। इनमें से एक बड़ा वर्ग है जो ऑटो, वैन, जीप या टेम्पो जैसे निजी वाहनों से स्कूल आता-जाता है। दुखद बात यह है कि इन स्कूल वाहनों में से कई पूरी तरह से “अनफ़िट” होते हैं — यानी न तो वे तकनीकी रूप से सुरक्षित हैं, न ही उनमें बच्चों की सुरक्षा के उचित इंतज़ाम होते हैं। ऐसे में जब किसी दुर्घटना की खबर आती है, तो सवाल उठता है: कौन है ज़िम्मेदार? शासन, प्रशासन या अभिभावक?
शासन और प्रशासन की प्राथमिक ज़िम्मेदारी होती है कि वह सार्वजनिक सुरक्षा को सुनिश्चित करें। मोटर व्हीकल एक्ट के तहत स्कूल वाहनों के लिए कई सख़्त नियम बनाए गए हैं — जैसे फिटनेस सर्टिफिकेट, सीएनजी अनिवार्यता, स्पीड गवर्नर, फर्स्ट एड किट, और प्रशिक्षित ड्राइवर आदि।
लेकिन अक्सर ये नियम सिर्फ़ कागज़ों तक सीमित रह जाते हैं।
प्रशासन की तरफ से निरीक्षण की कमी, घूसखोरी, और राजनीतिक संरक्षण के कारण कई अनफिट स्कूल वाहन सड़कों पर धड़ल्ले से चल रहे हैं। इस लापरवाही का खामियाजा मासूम बच्चों को भुगतना पड़ता है।
अभिभावकों की भी इसमें एक बड़ी भूमिका है। कई बार सुविधा, सस्ते दाम, या लापरवाही के चलते वे ऐसे वाहनों को चुन लेते हैं जिनकी हालत ठीक नहीं होती।
कुछ अभिभावक यह सोचते हैं कि “सब बच्चे इसी से जाते हैं, तो हमारे भी चले जाएंगे।”
लेकिन यह सोच बहुत ख़तरनाक है। किसी भी वाहन में अपने बच्चे को बैठाने से पहले उसकी फिटनेस, ड्राइवर की योग्यता और लाइसेंस की जांच करना अभिभावक की नैतिक ज़िम्मेदारी है।
कई स्कूल सीधे तौर पर वाहनों को नियुक्त करते हैं या अप्रत्यक्ष रूप से उनकी सिफारिश करते हैं। ऐसे में स्कूल की ज़िम्मेदारी बनती है कि वे सुनिश्चित करें कि कोई भी वाहन जो उनके छात्रों को लाता-ले जाता है, वह पूरी तरह से सुरक्षित हो।
इस गंभीर समस्या के लिए केवल एक पक्ष को दोषी ठहराना सही नहीं होगा। यह एक सामूहिक असफलता है:
• शासन और प्रशासन की निष्क्रियता,
• अभिभावकों की लापरवाही,
• और स्कूलों की उदासीनता
बच्चों की सुरक्षा कोई विकल्प नहीं, बल्कि अनिवार्यता होनी चाहिए।