
हिन्दू राष्ट्र की अलख जगाने वाले वीर शिवा जी का जन्म 20 अप्रेल 1627 को जुन्नर के समीप शिवनेर के पहाड़ी दुर्ग में हुआ था। उनके गुरु थे तीन भट्ट ब्राह्मण — राजतिलक करने वाले गागा भट्ट, हिंदुत्व की रक्षा का मंत्र देने वाले समर्थ गुरू रामदास जी व देशभक्ति तथा वीरता का जोश भरने वाले भूषण भट्ट। शिवाजी की रंगों में भी भट्ट ब्राह्मण का ही रक्त संचरित हो रहा था। मालवा से कन्नौज- उदयपुर (राजस्थानी राणा) होते हुए महाराष्ट्र पहुंचने वाला भट्ट कुल नाग भट्ट के गुर्जर-प्रतिहार वंश की ही देन हैं। गुर्जर-प्रतिहार से तात्पर्य है गुर्जर के रहने वाले प्रतिहार । गुर्जर मालवा प्रदेश के एक क्षेत्र का नाम था और प्रतिहार गुप्त वंश के शासन में एक *महत्वपूर्ण *पद* था जिसका काम था आगंतुकों को राजा से मिलाना-जुलाना। नाग भट्ट के पूर्वज इस पद को सुशोभित करते रहे इसलिए वे गुर्जर-प्रतिहार कहलाये। गुर्जर नरेश ने हर्ष वर्धन के दामाद बल्लभी के राजा ध्रुवसेन द्वितीय को सादी के पूर्व शरण दी थी । हर्ष वर्धन ने ध्रुवसेन को हराकर उससे अपनी पुत्री की सादी कर उसे सदा के लिए अपना मित्र बना लिया था।
गुर्जर-प्रतिहारवंश की स्थापना आठवीं सदी में नाग भट्ट ने मालवा में की थी।* इस वंश के प्रतापी राजा मिहिरभोज ने अपनी राजधानी मालवा (गुरजर प्रदेश) से कन्नौज स्थानान्तरित कर वहां 50 वर्ष राज्य किया। सामवेद की राणायनी शाखा वाले कन्नौज के भट्ट ब्राह्मण राजकाज में बढ़ चढ़ कर काम करते रहे। इस वंश के अंतिम शासक यशपाल की 1085 में हत्या कर जब चन्द्रदेव ने गहड़वाल वंश की स्थापना की तब राजकाज में लगे सामवेद की राणायनी शाखा वाले राणा भट्ट ब्राह्मण राजस्थान , रायबरेली , कानपुर (तिविक्रमपुर ) पलायन कर गये। इसी तिविक्रमपुर में बाद में भूषण भट्ट के पिता रत्नाकर , जो त्रिकाल संध्या करने से त्रिपाठी कहलाये, बिहारी कवि, मतिराम तथा वीरबल जैसे प्रसिद्ध कवि व राजदरबारी पैदा हुए। वीरबल अकबर के मित्र बने, बिहारी जयसिंह के राजकवि हुए। मतिराम भी प्रसिद्ध कवि हुए और अपने वंश के महान संत कवि, अकबर के संरक्षक, गुरू व राजनीतिज्ञ नरहरि दास की बसाई असनी (अब फतेहपुर जनपद) में बस गये।
वीर शिवाजी के पूर्वज राजा के पुत्र होंने से राजपुत्र (राजपूत) तथा राज कर्म करने व क्षत्रिय राजाओं से संबंध स्थापित करने से क्षत्रिय कहलाए क्यों कि राजा राजा के यहां ही शादी करता है।
सामवेद की राणायनी शाखा वाले कन्नौज के राणा भट्ट ब्राह्मण से राणा राजपूत और शासन अर्थात् क्षत्रिय कर्म से क्षत्रिय कहलाए। किन्तु महाराष्ट्र में शिवाजी को कोई क्षत्रिय नहीं मान रहा था। इसलिए उनके राजतिलक का विरोध होता रहा। तब उन्हें क्षत्रिय सिद्ध करके राजतिलक करने के लिए गागाभट्ट को वाराणसी से जाना पड़ा। शिवा जी में देशभक्ति व वीरता का जोश भरने का कार्य उनके राजकवि भूषण करते रहे।