माल किसान का, कीमत लगा रहा कोई दूसरा, खेती पर निर्भर किसान सदमे में कर लेता है आत्महत्या!

सभी फसलों पर msp का अर्थ है किसान को लाभ एवं जनता को भी लाभ, सत्ता में बैठे लोगों एवं व्यापारियों को नुकसान! मतलब ₹50 किलो किसान के माल को कोई भी ₹25 किलो में मनमर्जी से नहीं खरीद पाएगा और ₹50 किलो किसान के माल को कोई भी ₹100 में मनमर्जी से नहीं बेच पाएगा!

जिस दर्द को लेकर सोता है उसी दर्द को लेकर जागता है, कृषि प्रधान भारत में अन्नदाताओं को कब मिलेगी सभी फसलों पर msp, लगभग 125 फसलों की पैदावारी की जाती है। लगभग 85 मुख्य फसले हैं, 23 फसलों पर msp है, 28 फसलों पर देने की बात की जा रही है। लगभग 14% ही खरीदारी होती है लेकिन यह उचित msp नहीं है।

पूरे देश में सबसे ज्यादा धान एवं गेहूं की फसलें बोई जाती है, इन दोनों वैरायटी का बड़े पैमाने पर निर्यात किया जाता है। इस समय धान की फसल की कटाई जोरों पर है, धान की फसल पर सरकार ने msp ₹23. 20 पैसे किलो रखा है। लागत और माल की कीमत के हिसाब से इस वैरायटी का msp लगभग ₹38 किलो होना चाहिए। C2 + 50 अगर रखा जाए तो लगभग ₹52 किलो होना चाहिए।

7 बिसे के एक बीघे में धान की फसल में लागत ₹5000 से ज्यादा आ रही है, जिसका कारण मजदूरी एवं कीटनाशक दवाइयां आदि का महंगा होना, मजबूरी में ज्यादा इस्तेमाल होना है। कंबाइन मशीन से कटाई नहीं कराकर अगर मजदूरों द्वारा धान की फसल की कटाई कराते हैं तो खर्च ₹7500 होता है। धान की पैदावारी एक बीघे में ज्यादातर 3 से 4 कुंटल होती है। ₹23. 20 पैसे के हिसाब से 4 कुंतल पर ₹9280 मिला, ठेके पर खेती अगर की जा रही है तो ₹2000 से ₹3000 बिघे 9280 – 2500= ₹7780 बचत।

फसल बीमा योजना से खर्च ₹1500 बढ़ जाता है तो कुल मिला ₹6280, फसल की लागत ₹7500, फसल बीमा से घाटा हो गया ₹1220 तो बचत गई तेल लेने। लगभग 14% किसान के माल की सरकार खरीद करती है बाकी अनाज मंडी में बेचा जाता है, 90% किसान महीनो तक अपने माल को बेचता है। व्यापारी क्वालिटी में नुक्स एवं आदि हथकंडे बताकर सस्ते में खरीद लेता है जो सभी माल का औसत लगभग ₹18 किलो आता है।

अब गंभीर विषय है कि किसान एवं उसका परिवार 24 घंटे खेत में कार्य करता है, किसी भी कारण से फसल पूरी तरह से बर्बाद होने पर कोई सहायता राशि नहीं मिलती। अगर मिलती है तो ऊंट के मुंह में जीरा जैसी बात होती है। लेकिन वह भी लगभग 10% किसान को ही लाभ मिल पाता है बाकी को नहीं, किसान की मजदूरी नहीं। कृषि यंत्रों पर लाखों रुपए खर्च होते हैं यंत्र हमेशा अमर नहीं रहते खेत की कीमत नहीं जोड़ी जाती है।

खेती पर निर्भर किसान नुकसान नहीं उठा पाता और सदमे में आत्महत्या की तरफ चला जाता है। लगभग 12000 किसान हर वर्ष इस समय आत्महत्या कर रहा है। अब सबसे गंभीर सवाल यह भी है कि माल किसान का, कीमत कोई दूसरा लगा रहा है। सभी प्रकार के प्रोजेक्ट बनाने वाले अपने माल के प्रोडक्टों को प्रिंट लगाकर बाजार में बेच रहे हैं। यहां तक की ₹1 की माचिस पर भी प्रिंट लगाकर बेचा जा रहा है।

सभी के समझने योग्य विषय है कि एक कुंतल धान में लगभग 60 किलो चावल निकलते हैं, msp ₹23. 20 पैसे किलो। किसान का धान ₹100 किलो चावल और लगभग ₹12 किलो किनकी निकलती है जो लगभग ₹25 किलो बेची जाती है। धान का छिलका ₹8 किलो बेचा जाता है, 6000 + 300 + 800= ₹7100 में बेच दिया। ₹2500 का व्यापारी का खर्च जोड़ दिया जाए तो लगभग ₹2300 का मुनाफा सरकारों से मिलकर कमा रहा है।

धान की लगभग 17 वैरायटी हैं, सभी का आकलन एक जैसा ही है। यह अलग विषय है कि हरियाणा, पंजाब, राजस्थान में लगभग 70% msp पर खरीदारी की जाती है, बाकी राज्यों में नाम मात्र है। गेहूं, गन्ने, सोयाबीन आदि फसलों से व्यापारी सरकार के संरक्षण में दोगुना पैसा कमा रहे हैं। 2014 से पहले बीजेपी सरकार ने कहा था कि हमारी सरकार बनाए हम सभी फसलों पर msp गारंटी कानून बनाएंगे। पिछले 10 साल का आकलन किया जाए तो किसान के माल की कम कीमत मिलने पर लगभग 50 लाख करोड रुपए का नुकसान हो चुका है।

बीजेपी सरकार ढोल पीटी है कि हम सम्मान निधि दे रहे हैं। फर्ज करो एक किसान 100 कुंतल धान पैदा कर रहा है, पिछली सरकारे msp पर माल खरीदने पर ऊपर से ₹300 बोनस एक कुंतल पर देती थी। लेकिन बीजेपी सरकार ने बोनस को समाप्त कर दिया। किसान सम्मन निधि के तौर पर देते हैं ₹6000- ₹30000 हैं = ₹24000, धान एवं गेहूं पर बोनस ₹250 कुल ₹25000 गेहूं पर (₹49000 ) को सरकार डकार रही है। लेकिन सम्मान निधि मिलने वाले किसान मात्र 15% ही हो सकते हैं।

सबसे बड़ा मुख्य बिंदु केंद्र सरकार एवं प्रदेश सरकार अवश्य ध्यान दें, किसान की धान की 1509 वैरायटी ₹4000 कुंतल के हिसाब से खरीदारी होनी चाहिए एवं बासमती, ₹8000 कुंतल से खरीदारी होना चाहिए, 1121, मुच्छल की खरीदारी ₹5000 से ज्यादा होनी चाहिए।

जय जवान जय किसान सत्ता में बैठे लोगों अन्नदाता की कर लो पहचान, वरना तो बदनामी का झेलना पड़ेगा अंजाम, जब तक दुखी किसान रहेगा हर तरफ तूफान रहेगा।

चौo शौकत अली चेची राष्ट्रीय उपाध्यक्ष भाकियू (अंबावता) एवं
पिछड़ा वर्ग उo प्रo सचिव (सपा)

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निशाकांत शर्मा (सहसंपादक)

यह खबर /लेख मेरे ( निशाकांत शर्मा ) द्वारा प्रकाशित किया गया है इस खबर के सम्बंधित किसी भी वाद - विवाद के लिए में खुद जिम्मेदार होंगा

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