
@#,मुहल्ले में कटोरियों का घूमना–
चौपाल पर खड़ा नीम का पेड़–
जैसे अम्मा का आंचल हो–
छांव तले बैठकर एक दूसरे के–
जैसे दुख सुख का बटवारा हो–
मन की तराजू पर भावों का भार–
जैसे अरमानों की फसल का बंटवारा हो–
मोहल्ले में कटोरियों का घूमना–
जैसे गांव में एक ही रसोई हो–
दहलीज पर बड़ों की खांसी की दस्तक–
जैसे अदब और तहजीबों की पाठशाला हो–
एक खुशी सारे गांव को महका देती थी–
जैसे एक के दर्द में पूरा गांव कराहता हो–
दोपहरी के यौवन पर झिल मिलाती गर्म शोलों की लहरियां–
जैसे आंचल में बयार भर कर मिट्टी से खेलती हो–
कभी कभी शरारतों से भरी छतों पर आकर–
नमी को सुखाती ओढ़नी उड़ा कर दूर-दूर तक ले जाती हो–
दीप्ति चौहान।