वृक्षों की लाशों पर होने वाला विकास रोकना अच्छी खबर

वृक्षों की लाशों पर होने वाला विकास रोकना अच्छी खबर

विश्व पर्यावरण दिवस के दो दिन बाद ही भोपाल में जनता के दबाव में मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने पीपल और बरगद के दो पेड़ काटने पर रोक लगा दी। दरअसल एक सड़क निर्माण के लिए उक्त पेड़ों को काटने की कोशिश लोक निर्माण विभाग कर रहा था किंतु निकटवर्ती आवासीय कालोनी के निवासी इसके विरोध में संगठित हुए और छोटे बच्चे इन पेड़ों से लिपटकर खड़े हो गए। लोगों का कहना था कि महिलाएं उन वृक्षों की पूजा करती हैं और फिर 20 वर्ष पुराने पीपल और बरगद के इन पेड़ों के कटने से पर्यावरण को भी क्षति पहुंचेगी। शाम होते – होते मुख्यमंत्री ने एक वीडियो प्रसारित करते हुए पेड़ों को काटने की कार्रवाई पर रोक लगाते हुए कहा कि सड़क घुमा दी जावेगी किंतु वृक्ष जहां हैं वहीं खड़े रहेंगे। उन्होंने छोटे बच्चों की आंदोलन में सहभागिता का भी उल्लेख किया। साथ ही लोगों से प्रतिदिन पौधारोपण की अपील भी की। उल्लेखनीय है श्री चौहान भी नित्यप्रति पौधारोपण करते हैं । दो वृक्षों को बचाने संगठित हुए क्षेत्रीय जन , विशेष रूप से बच्चे बधाई के पात्र हैं । मुख्यमंत्री की भी प्रशंसा की जानी चाहिए जिन्होंने पेड़ों को बचाने के लिए सड़क कुछ दूर से बनाने का निर्देश दिया। लेकिन इसका दूसरा पहलू भी है । उक्त घटना चूंकि राजधानी भोपाल की है इसलिए उसकी गूंज मुख्यमंत्री के कानों तक पहुंच गई और दो दशक पुराने पवित्र वृक्ष कत्ल होने बच गए। लेकिन प्रदेश के बाकी हिस्सों में न जाने कितने हरे – भरे वृक्ष रोजाना काटे जाते हैं किंतु शासन और प्रशासन के कानों में जूं तक नहीं रेंगती। लेकिन जैसी जागरूकता और जिद भोपाल की बाग मुगलिया एक्स्टेंशन कालोनी के वाशिंदों ने दिखाई वैसी अन्य शहरों में देखने नहीं मिलती। और जहां दिखाई भी देती है वहां स्थानीय जनप्रतिनिधि जनता का साथ देने के बजाय उसे विकास विरोधी बताने लगते हैं। प्रदेश के ही जबलपुर शहर में डुमना हवाई अड्डे जाने वाली सड़क चौड़ी करने सैकड़ों वृक्ष बेरहमी से काट डाले गए। उल्लेखनीय है भोपाल की जनता ने स्मार्ट सिटी परियोजना को उन स्थानों से हटवाकर अन्यत्र स्थानांतरित करवा दिया था क्योंकि उसकी वजह से सैकड़ों वृक्ष काट दिए जाते। संदर्भित घटना में जिन अधिकारियों ने उन वृक्षों को काटने का निर्णय लिया उनकी बुद्धि और विवेक पर भी सवाल उठते हैं। सड़क निर्माण की योजना बनाते समय ही इस बात का ध्यान क्यों नहीं रखा गया कि दो दशक पुराने पर्यावरण की दृष्टि से बेहद उपयोगी वृक्ष बीच में आयेंगे तो उन्हें बचाने हेतु सड़क को थोड़ा इधर – उधर किया जाता । विकसित देशों में तो विशाल वृक्षों को विकास कार्यों में बाधक बनने पर दूसरी जगह स्थानांतरित करने की तकनीक का इस्तेमाल होता है। हमारे देश में भी कई जगह ऐसा हुआ लेकिन उसमें सफलता का प्रतिशत कम ही है। ऐसे में बेहतर यही होता है कि निर्माण की ऐसी योजना बनाई जावे जिससे वृक्ष भी बचे रहें और विकास भी न रुके। ये तो किसी को भी बताने की जरूरत नहीं है कि 20 वर्ष पुराने ऐसे वृक्षों को काटने से कितना नुकसान होता जो 24 घंटे ऑक्सीजन वातावरण में प्रवाहित करते हैं । पीपल और बरगद की पूजा का संस्कार किसी अंधविश्वास के कारण नहीं अपितु प्रकृति के संरक्षण में इनके योगदान के कारण है। ऐसे में इस तरह की विकास योजनाएं बनाते समय ये ध्यान में रखा जाना चाहिए था कि उसके दायरे में आने वाले वृक्षों को , खासकर जो काफी पुराने और बड़े हों , काटने से बचा जावे। लोकनिर्माण विभाग के जिन अभियंताओं ने सड़क की योजना बनाई उनसे ये पूछा जाना चाहिए कि उन्होंने इस बात का ध्यान क्यों नहीं रखा ? इस बारे में ये भी उल्लेखनीय है कि भोपाल देश की उन राजधानियों में से है जो अपनी हरियाली के लिए जानी जाती जाती हैं । यहां के बड़े और छोटे तालाब जल संरक्षण के सर्वश्रेष्ठ उदाहरण हैं। प्रदेश की राजधानी बनने के बाद यहां कांक्रीट की जंगलनुमा अट्टालिकाएं बनती गईं और शहर की सीमाएं भी विस्तारित हुईं किंतु आज भी भोपाल प्राकृतिक दृष्टि से काफी सुंदर और समृद्ध है। ऐसे में ये कहा जा सकता है कि इतने बड़े शहर में एक – दो वृक्ष कट जाने से क्या हो जाता ? लेकिन इसी सोच ने तो देश के अनेक इलाकों से जंगल साफ कर दिए । हिमालय में समय -समय पर आने वाली प्राकृतिक आपदाएं भी वृक्षों की अंधाधुंध कटाई का ही दुष्परिणाम है। म.प्र में सौभाग्यवश वन संपदा प्रचुर मात्रा में है । हालांकि विकास कार्यों के कारण बड़ी संख्या में वृक्षों का कत्ल हो चुका है किंतु धीरे – धीरे पर्यावरण की सुरक्षा के प्रति जागरूकता बढ़ी है । भोपाल की आवासीय कालोनी के निवासियों ने उसी का परिचय देते हुए दो वृक्षों की रक्षा के लिए मोर्चा खोला और अंततः मुख्यमंत्री ने खुद होकर उनकी मांग को मंजूर करने की सौजन्यता दिखाई। इसे निकट भविष्य में होने वाले विधानसभा चुनाव से जोड़कर भी देखा जा सकता है किंतु ये भी सही है कि संचार क्रांति के दौर में इस तरह की घटनाओं का व्यापक प्रचार होने से अन्य लोग भी प्रभावित होते हैं। हालांकि ये बात तो स्वीकार करनी ही होगी कि विकास कार्य नहीं रोके जा सकते। राजमार्ग , बांध और आवासीय क्षेत्रों के निर्माण भी समय की मांग होने से जारी रहेंगे किंतु वैसा करते समय प्रकृति और पर्यावरण को कम से कम नुकसान हो ये ध्यान में रखना जरूरी है। वृक्ष को भी मनुष्य की तरह मानते हुए उसकी जीवन रक्षा की जानी चाहिए।

रवीन्द्र वाजपेयी

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निशाकांत शर्मा (सहसंपादक)

यह खबर /लेख मेरे ( निशाकांत शर्मा ) द्वारा प्रकाशित किया गया है इस खबर के सम्बंधित किसी भी वाद - विवाद के लिए में खुद जिम्मेदार होंगा

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