राजस्व और चकबंदी अधिकारियों द्वारा पारित आदेश के खिलाफ अनुच्छेद 226 के तहत दायर रिट याचिका पोषणीय है: इलाहाबाद हाईकोर्ट

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राजस्व और चकबंदी अधिकारियों द्वारा पारित आदेश के खिलाफ अनुच्छेद 226 के तहत दायर रिट याचिका पोषणीय है: इलाहाबाद हाईकोर्ट

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?हाल के एक फैसले में, इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि राजस्व अधिकारियों और चकबंदी अधिकारियों द्वारा पारित आदेश के खिलाफ अनुच्छेद 226 के तहत रिट याचिका पोषणीय है।

⚫विचाराधीन मामले में टाइटल विवादों से संबंधित मामलों में राजस्व अदालतों द्वारा पारित आदेशों के खिलाफ भारत के संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत एक रिट याचिका दायर करने की उपयुक्तता पर विवाद शामिल है।

हाईकोर्ट ने फैसला सुनाया:

?पक्षकारों के विद्वान अधिवक्ताओं के तर्कों एवं इस प्रकार दिये गये निर्णयों, जिन पर यहाँ ऊपर विचार किया गया है, को ध्यान में रखते हुए मेरा यह सुविचारित मत है कि राजस्व प्राधिकारी अथवा चकबन्दी प्राधिकारी द्वारा पारित किये जा रहे आदेश सिविल न्यायालयों, न्यायिक प्राधिकारी द्वारा पारित किये जाने वाले आदेश नहीं हैं।

?इसलिए, भारत के संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत रिट याचिकाओं की पोषणीयता के संबंध में विरोधी पक्षों के विद्वान वकील द्वारा उठाई गई प्रारंभिक आपत्तियों को खारिज किया जाता है। भारत के संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत चकबंदी/राजस्व प्राधिकारियों के आदेशों को चुनौती देने वाली इन रिट याचिकाओं को पोषणीय माना जाता है।

✳️याचिकाकर्ताओं की ओर से श्री एम.ई. खान ने तर्क दिया कि चूंकि आदेश चकबंदी अधिकारियों द्वारा पारित किए गए थे, जो कि राजस्व अधिकारी नहीं हैं, निजी विरोधी पक्षों के वकील द्वारा उठाई गई अनुरक्षणीयता के संबंध में आपत्ति वर्तमान मामले में लागू नहीं होगी।

☸️याचिकाकर्ताओं के वकील ने राधेश्याम और अन्य बनाम छवि नाथ और अन्य, (2015) 5 SCC 423, और किरण देवी बनाम बिहार राज्य सुन्नी में दिए गए सर्वोच्च न्यायालय के पूर्ण पीठ के फैसले पर भरोसा किया। वक्फ बोर्ड और अन्य, (2021) एआईआर (एससी) 1775, यह तर्क देने के लिए कि अनुच्छेद 226 के तहत एक रिट राजस्व अधिकारियों द्वारा पारित आदेशों के खिलाफ हो सकती है।

हालांकि,

?मुख्य स्थायी वकील और निजी विरोधी पक्षों के वकील ने राधे श्याम मामले में दिए गए फैसले के पैरा 18 का हवाला देते हुए तर्क दिया कि न्यायिक/सिविल अदालतों और अन्य प्राधिकरणों/ट्रिब्यूनल/अदालतों के बीच अंतर रिट याचिका अनुच्छेद 226 के तहत की पोषणीयता निर्धारित करने के लिए प्रासंगिक नहीं है।

?इलाहाबाद हाईकोर्ट ने 3 मई, 2023 के अपने आदेश में कहा कि प्रत्याक्षेप की रिट स्पष्ट रूप से गलत और न्यायिक/सिविल अदालतों के अलावा अन्य अधिकारियों या अदालतों के अधिकार क्षेत्र के बिना हो सकती है।

हालांकि

? अदालत ने स्पष्ट किया कि भारत के संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत न्यायिक/दीवानी अदालतों के आदेशों के खिलाफ कोई रिट याचिका नहीं होनी चाहिए।

⏹️अदालत ने आगे कहा कि अनुच्छेद 226 के तहत एक याचिका या अनुच्छेद 227 के तहत एक याचिका के रूप में कार्यवाही का नामकरण अप्रासंगिक और सारहीन है, और हाईकोर्ट को शीर्ष अदालत के निर्देशों का अक्षरशः पालन करना चाहिए।

?यह फैसला न्यायमूर्ति राजेश सिंह चौहान ने दिनेश चंद्र उर्फ दिनेश चंद्र तिवारी व अन्य बनाम उप निदेशक चकबंदी सुलतानपुर व अन्य के मामले में सुनाया।

♋हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया है कि ट्रिब्यूनल या न्यायिक/दीवानी अदालतों के अलावा अन्य प्राधिकरणों या अदालतों के स्पष्ट रूप से गलत और बिना अधिकार क्षेत्र वाले आदेश के खिलाफ उत्प्रेषण की रिट हो सकती है।

?“राधेश्याम के फैसले में, सर्वोच्च न्यायालय ने दीवानी अदालत और दीवानी अदालत के अलावा अन्य द्वारा पारित किए जा रहे आदेशों के बीच अंतर को यह कहते हुए उकेरा है कि दीवानी अदालत के न्यायिक आदेश अनुच्छेद 226 भारत का संविधान के तहत रिट क्षेत्राधिकार के लिए उत्तरदायी नहीं हैं, अदालत ने कहा।

❇️अदालत ने आगे स्पष्ट किया कि अनुच्छेद 226 के तहत एक याचिका या अनुच्छेद 227 के तहत एक याचिका के रूप में कार्यवाही का नामकरण अप्रासंगिक और सारहीन है, और हाईकोर्ट को शीर्ष अदालत के निर्देशों का अक्षरशः पालन करना चाहिए।

केस का नाम :- दिनेश चंद्र उर्फ दिनेश चंद्र तिवारी व अन्य बनाम उप निदेशक चकबन्दी, सुल्तानपुर व अन्य
केस नंबर: WRIT – B No.229 of 2023
बेंच: जस्टिस राजेश सिंह चौहान
आदेश दिनांक: 03.05.2023

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निशाकांत शर्मा (सहसंपादक)

यह खबर /लेख मेरे ( निशाकांत शर्मा ) द्वारा प्रकाशित किया गया है इस खबर के सम्बंधित किसी भी वाद - विवाद के लिए में खुद जिम्मेदार होंगा

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